सूर्यास्त के बाद क्यों बढ़ जाती है यक्षिणी की शक्ति
Yakshini Power Rises After Sunset – यक्षिणी शक्ति प्राचीन तांत्रिक परंपरा का गुप्त रहस्य है. यह देवदूत स्वरूप शक्तियाँ मानी जाती हैं, जिनका कार्य साधक के जीवन में आकर्षण, सौंदर्य, संपन्नता और मनोकामना सिद्धि के द्वार खोलना है. सामान्य व्यक्ति इनके रहस्य से अनजान रहता है, पर अनुभवी साधक जानते हैं कि यक्षिणी ऊर्जा किसी साधारण समय में नहीं जागती.
ऋषि, तांत्रिक और सिद्ध पुरुष बताते हैं कि सूर्यास्त के पश्चात यक्षिणी शक्ति का प्रभाव तेजी से बढ़ जाता है. इसका संबंध प्रकृति की ऊर्जा, पंचतत्व और सूक्ष्म ब्रह्मांड की धारा से है. सूर्य प्रकाश में स्थूल ऊर्जा सक्रिय रहती है, जबकि सूर्यास्त के बाद सूक्ष्म ऊर्जा हावी होती है. यही समय साधना को तेज परिणाम देता है.
DivyayogAshram की परंपरा में भी यह माना जाता है कि सूर्यास्त के बाद का समय मन और प्राण ऊर्जा को गहराई से सक्रिय करता है. साधक शांत रहता है, वातावरण स्थिर रहता है और चित्त सूक्ष्म दिव्य तरंगों को ग्रहण करता है.
इस अध्याय में आप समझेंगे कि सूर्यास्त के बाद यक्षिणी शक्ति क्यों प्रबल होती है. यह रहस्य ज्ञान साधक को दिशा देता है और साधना की सफलता का मार्ग खोलता है.
सृष्टि में दिन और रात का ऊर्जा परिवर्तन
सृष्टि दिन और रात के संतुलन पर चलती है. दिन में सूर्य की स्थूल ऊर्जा सक्रिय रहती है. रात में चंद्र और सूक्ष्म ऊर्जा सक्रिय रहती है.
सूर्यास्त के समय दोनों ऊर्जाएँ मिलती हैं. इस संगम में अत्यंत शक्तिशाली सूक्ष्म द्वार खुलते हैं. यक्षिणी इसी द्वार से जुड़ी शक्तियों में से एक है. दिन की कठोरता समाप्त होती है. रात की कोमलता जन्म लेती है.
यक्षिणी ऊर्जा को संवेदनशीलता, आकर्षण और चित्त की गहराई पसंद है. सूर्यास्त का समय ऊर्जा परिवर्तन की घंटी है. यह क्षण साधक के लिए वरदान बनता है.
तीन कारण
- प्राण ऊर्जा का दिशा परिवर्तन
- मन की तरंगें शांत होना
- सूक्ष्म लोक से संपर्क का खुलना
सूक्ष्म लोक की ऊर्जा और यक्षिणी शक्ति
यक्षिणी शक्ति सूक्ष्म लोक की ऊर्जा है. स्थूल जगत की सीमाएँ इसे बांध नहीं पाती. दिन में मन दौड़ता है. रात में मन शांत होता है. शांत मन ही सूक्ष्म ऊर्जा ग्रहण करता है.
सूर्यास्त पर ब्रह्मांडीय कंपन बदलते हैं. यह परिवर्तन यक्षिणी साधना को अनुकूल बनाता है. पीठिका, मंत्र और भावना का संयोजन इस समय अधिक प्रभावी होता है.
यक्षिणी शक्ति साधक की आंतरिक ऊर्जा को जगाती है. यह आकर्षण और सिद्धि की शक्ति है. चंद्र ऊर्जा इस साधना को सहारा देती है.
ध्यान
यक्षिणी साधना में चित्त की शुद्धता और भाव आवश्यक है. बिना शांति साधना व्यर्थ होती है.
मंत्र
ॐ ह्रीं श्रीं यक्षिणेश्वरी क्लीं नमः
सूर्यास्त का आध्यात्मिक महत्व
सूर्यास्त समय योग, ध्यान और मंत्र का सर्वोत्तम समय माना गया है.
इस समय प्राण में शांति उतरती है. शरीर का रजोगुण घटता है. तमोगुण बढ़ने से पहले एक पवित्र क्षण बनता है जिसे संधि काल कहा गया है.
संधि काल में मंत्र का प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है. यक्षिणी शक्ति इसी क्षण का लाभ देती है.
संधि काल के गुण
- विचार धीमे होते हैं
- इंद्रियाँ संवेदनशील होती हैं
- मन में साहस और करुणा दोनों जागते हैं
- साधक का चित्त दिव्य तरंग पकड़ता है
मन की शांति और यक्षिणी उपस्थिति
यक्षिणी साधना मन के सूक्ष्म स्तर पर कार्य करती है. मन जितना शांत होगा, यक्षिणी ऊर्जा उतनी ही प्रबल होगी.
सूर्यास्त पर बाहर की आवाजें कम होती हैं. प्रकृति धीमी होती है. इस समय साधक की चेतना स्थिर होती है.
स्थिर चेतना ही ऊर्जा को पकड़ती है. यदि मन अशांत हो, तो साधना निष्फल रहती है.
साधक का भाव
सच्चा श्रद्धा भाव साधना का कवच है. अहंकार साधना को नष्ट करता है.
रात्रि और आकर्षण ऊर्जा की संगति
यक्षिणी शक्ति आकर्षण, सम्मोह, करुणा और संपन्नता की ऊर्जा है. इन गुणों की जड़ रात्रि में प्रबल होती है.
रात्रि चंद्र, जल और भावना की ऊर्जा से जुड़ी है. यक्षिणी इसी भावना जगत की संरक्षिका है.
दिन में मन बाहरी संसार में रहता है. रात में मन भीतर उतरता है. भीतर की ऊर्जा ही यक्षिणी जगत का पुल है.
चित्त की गहराई और साधना शक्ति
यक्षिणी साधना बाहरी कर्म से अधिक आंतरिक अनुभव है. सूर्यास्त पर चित्त अपनी गहराई में उतरने लगता है.
चित्त का तल जितना शांत होगा, ऊर्जा उतनी तेज जागेगी. इस समय साधक के मंत्र की तरंग भीतर प्रवेश करती है.
मनोयोग
मंत्र, ध्यान और इरादा साधक की ढाल है. इनका सही संयोजन परिणाम देता है.
पंचतत्व और ऊर्जा संतुलन
पंचतत्व हमारे शरीर और ब्रह्मांड के आधार हैं.
- पृथ्वी
- जल
- अग्नि
- वायु
- आकाश
सूर्यास्त समय अग्नि से जल ऊर्जा में परिवर्तन होता है. यही पल ऊर्जा का द्वार खोलता है. यक्षिणी शक्ति जल और आकाश तत्व से जुड़ी है.
जब तत्व संतुलित होते हैं, तब साधना सिद्धि की ओर बढ़ती है.
यक्षिणी और भावनात्मक ऊर्जा
यक्षिणी प्रेम, करुणा और आकर्षण की दिव्य शक्ति है.
वह कठोर हृदय से प्रसन्न नहीं होती.
सूर्यास्त समय भावनाएँ सूक्ष्म हो जाती हैं. साधक में समर्पण आता है. यही भाव यक्षिणी को आकर्षित करता है.
आवश्यक गुण
- नरम हृदय
- समर्पण
- पवित्र प्रेम
साधना की गोपनीयता और समय
यक्षिणी साधना गुप्त ऊर्जा है. प्रकट करने पर शक्ति कम होती है. सूर्यास्त इसका उचित समय है, क्योंकि उस समय ध्यान लगे रहता है और साधक अकेला रहता है.
गोपनीयता ऊर्जा को सुरक्षित रखती है. यह नियम प्राचीन काल से चला आ रहा है.
चंद्र ऊर्जा और स्त्री शक्तियाँ
यक्षिणी ऊर्जा स्त्री शक्ति है. चंद्र भी स्त्री तत्व का प्रतिनिधि है. सूर्यास्त के बाद चंद्र ऊर्जा उभरती है.
चंद्र मन का स्वामी है. इसलिए मन स्थिर करने पर यक्षिणी साधना फल देती है.
साधक की तैयारी
यक्षिणी साधना केवल समय पर निर्भर नहीं. साधक का आचरण, मन, और नियमितता भी मायने रखती है.
नियम
- मन और वाणी की पवित्रता
- अनुशासन
- सरल भोजन
- स्वच्छ स्थान
DivyayogAshram में यह नियम विशेष रूप से बताये जाते हैं.
असाधक के लिए चेतावनी
यक्षिणी शक्ति आकर्षक है, पर हल्की नहीं है. जो लोग केवल इच्छा या लालसा से साधना करते हैं, उन्हें लाभ नहीं मिलता. सच्चा मार्ग है संतुलन, संयम और आध्यात्मिक उद्देश्य.
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अंत मे
सूर्यास्त के बाद यक्षिणी शक्ति इसलिए बढ़ती है क्योंकि यह संधि काल सूक्ष्म ऊर्जा के जागरण का समय है. मन शांत रहता है, वातावरण स्थिर होता है और ब्रह्मांडीय द्वार खुलते हैं.
साधक इस क्षण में अपने भीतर उतरता है. यहीं से शक्ति प्रवेश करती है.
DivyayogAshram मानता है कि यक्षिणी साधना केवल इच्छा पूर्ति का मार्ग नहीं है. यह आत्म शक्ति जागरण का माध्यम है.
सूर्यास्त के बाद साधना करने से चित्त गहरा होता है. ऊर्जा संवेदनशील होती है. मंत्र का प्रभाव बढ़ता है. यही कारण है कि यक्षिणी शक्ति इस समय तेज हो जाती है.
यदि साधक शुद्ध मन, संकल्प और अनुशासन रखे, तो साधना शुभ परिणाम देती है. यक्षिणी ऊर्जा कृपा बनकर आती है और साधक का जीवन दिव्यता की ओर ले जाती है.








