Kurma Chakra – The Secret Energy Center of Stability

BOOK - 26-27 SEPT. 2026- DAKSHIN KALI SADHANA SHIVIR AT DIVYAYOGA ASHRAM (ONLINE/ OFFLINE)

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कूर्म चक्र: आध्यात्मिक स्थिरता और कुंडलिनी जागरण का रहस्यमय केंद्र

कूर्म चक्र एक गूढ़ तांत्रिक एवं आध्यात्मिक अवधारणा है, जिसका उल्लेख विभिन्न योग, तंत्र, और वैदिक ग्रंथों में मिलता है। इसे साधनात्मक प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण ऊर्जा केंद्र के रूप में देखा जाता है।

अवधारणा

  1. शरीर में स्थित स्थान – कूर्म चक्र को नाभि के नीचे (मूलाधार और स्वाधिष्ठान चक्र के मध्य) स्थित माना जाता है।
  2. ऊर्जा नियंत्रण केंद्र – यह चक्र शरीर में प्राण-ऊर्जा के प्रवाह को नियंत्रित करता है और स्थिरता प्रदान करता है।
  3. कूर्म अर्थात कछुआ – तंत्र शास्त्रों में ‘कूर्म’ का अर्थ कछुआ होता है, जो अपनी स्थिरता और सहनशीलता के लिए प्रसिद्ध है। कूर्म चक्र भी साधक को ध्यान, साधना और कुंडलिनी जागरण में स्थिरता प्रदान करता है।
  4. सांस नियंत्रण से संबंध – यह चक्र प्राणायाम एवं ध्यान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और साधक की चेतना को गहराई प्रदान करता है।

आध्यात्मिक महत्व

  • योग साधना में – कूर्म चक्र ध्यान और समाधि की गहराई को बढ़ाने में सहायक है।
  • तांत्रिक साधनाओं में – तंत्र मार्ग के साधक इस चक्र का उपयोग उच्च ऊर्जा जागरण के लिए करते हैं।
  • कुंडलिनी जागरण में – कूर्म चक्र जाग्रत होने पर कुंडलिनी शक्ति को संतुलित रूप से ऊपर उठाने में सहायता करता है।

लाभ

  1. मानसिक और भावनात्मक स्थिरता
  2. साधना में गहरी तल्लीनता और सफलता
  3. प्राण शक्ति का नियंत्रण और वृद्धि
  4. शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता में सुधार
  5. अलौकिक अनुभव और आध्यात्मिक जागरूकता

कूर्म चक्र अभ्यास विधि

कूर्म चक्र साधना को सफलतापूर्वक करने के लिए विशेष ध्यान, प्राणायाम और मंत्र जाप का अभ्यास आवश्यक है। यह साधना ध्यान और कुंडलिनी योग के लिए अत्यंत लाभकारी मानी जाती है।

1. आसन और मुद्रा

  • किसी शांत और पवित्र स्थान पर कंबल या आसन बिछाकर पद्मासन, सिद्धासन, या सुखासन में बैठें।
  • मेरुदंड (रीढ़) सीधा रखें और नेत्रों को हल्के से बंद कर लें।
  • हाथों को ज्ञान मुद्रा या कूर्म मुद्रा में रखें।

2. श्वास नियंत्रण (प्राणायाम अभ्यास)

कूर्म चक्र के जागरण में प्राणायाम की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

नाड़ी शोधन प्राणायाम – बाईं नासिका से श्वास लें, कुछ क्षण रुकें, फिर दाईं नासिका से श्वास छोड़ें। पुनः दाईं नासिका से श्वास लेकर बाईं से छोड़ें। यह चक्र 10-15 बार दोहराएं।
भ्रामरी प्राणायाम – गले के आधार को स्पंदित करते हुए “म” ध्वनि का उच्चारण करें और कंपन को नाभि तक महसूस करें।
कूर्म मुद्रा – सिर को झुका कर ठुड्डी को छाती से लगाएं, हाथों को घुटनों पर रखें, और धीरे-धीरे गहरी सांसें लें।


3. ध्यान (Meditation on Kurma Chakra)

ध्यान करने के लिए अपनी चेतना को नाभि के केंद्र (स्वाधिष्ठान और मूलाधार के मध्य) पर केंद्रित करें।
कल्पना करें कि वहां एक दिव्य सुनहरी या नीली ऊर्जा घूम रही है और शरीर में स्थिरता ला रही है।
मन को पूरी तरह से स्थिर रखें और विचारों को शांत करें।
साधना के दौरान शांति और गहराई को महसूस करें।


4. मंत्र जाप

कूर्म चक्र को जाग्रत करने के लिए निम्नलिखित मंत्रों का जाप किया जा सकता है:

बीज मंत्र: “ॐ कूर्माय नमः”
विकल्प मंत्र: “ॐ ह्रीं कूर्माय स्वाहा”
तांत्रिक मंत्र: (ॐ ह्रीं कुर्माय हुं फट्ट)

कम से कम 108 बार (1 माला) जाप करें। अनभवी साधकों के लिए 21 माला तक का जाप करने का निर्देश दिया जाता है।

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5. अभ्यास के दौरान सावधानियां

  • कोई भी साधना गुरु की अनुमति और मार्गदर्शन के बिना उग्र रूप से न करें।
  • साधना से पहले शुद्ध आहार (सात्त्विक भोजन) और संयमित जीवन शैली अपनाएं।
  • अभ्यास धीरे-धीरे बढ़ाएं, और शरीर में होने वाले परिवर्तनों पर ध्यान दें।
  • चित्त में अस्थिरता या मानसिक उथल-पुथल महसूस हो तो तुरंत साधना रोककर गुरु से परामर्श करें।

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6. अभ्यास से प्राप्त लाभ

  • मन और शरीर में स्थिरता आती है।
  • कुंडलिनी जागरण में सहायक होता है।
  • ध्यान और समाधि में प्रगति होती है।
  • जीवन में आत्मविश्वास और सहनशीलता बढ़ती है।
  • रोग प्रतिरोधक क्षमता में सुधार होता है।

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अंत मे

कूर्म चक्र साधना शरीर और मन को स्थिर करने वाली अत्यंत प्रभावशाली साधना है। जो साधक इसे नियमित रूप से करते हैं, उन्हें ध्यान, योग, और आध्यात्मिक साधनाओं में विशेष लाभ प्राप्त होते हैं। इस साधना को सही विधि और गुरु के मार्गदर्शन में करने से सिद्धि प्राप्त की जा सकती है।

“धैर्य, साधना, और नियमित अभ्यास ही सफलता की कुंजी है।”

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