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Mahakali Chalisa paath for protection

Mahakali Chalisa paath for protection

महाकाली चालीसा एक भक्तिगीत है जो देवी काली की स्तुति और आराधना के लिए गाया जाता है। देवी काली को शक्ति और विनाश की देवी माना जाता है। वे बुराइयों का नाश करने वाली, दुश्मनों को पराजित करने वाली और भक्तों को संरक्षण देने वाली देवी हैं। महाकाली का स्वरूप भयानक और शक्तिशाली होता है, जिसमें वे चार हाथों में विभिन्न अस्त्र-शस्त्र धारण करती हैं और उनके गले में नरमुंडों की माला होती है।

महाकाली चालीसा

॥दोहा॥
नमो नमो दुर्गे सुख करनी।
नमो नमो अम्बे दुख हरनी॥

निरंकार है ज्योति तुम्हारी।
तिहूं लोक फैली उजियारी॥

॥चौपाई॥
शशि ललाट मुख महा विशाल।
नेत्र लाल भृकुटि विकराल॥

रूप मातु को अधिक सुहावे।
दरश करत जन अति सुख पावे॥

तुम संसार शक्ति लै कीना।
पालन हेतु अन्न धन दीना॥

अन्नपूर्णा हुई जग पाला।
तुम ही आदि सुंदरी बाला॥

प्रलयकाल सब नाशन हारी।
तुम गौरी शिव शंकर प्यारी॥

शिव योगी तुम्हरे गुण गावें।
ब्रह्मा विष्णु तुम्हे नित ध्यावें॥

रूप सरस्वती को तुम धारा।
दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा॥

धरा रूप लक्ष्मी जग माही।
श्री नारायण अंग समाही॥

क्षीरसिन्धु में करत विलासा।
दया सिंधु दीजे मन आसा॥

हिंगलाज में तुम्हीं भवानी।
महिमा अमित न जात बखानी॥

॥दोहा॥

मातु रूप महाकाली धारा।
देव सभी है स्तुति तुम्हारा॥

॥चौपाई॥
मातंगिनी धूमावती माता।
भुवनेश्वरी बगला सुख दाता॥

श्री भैरव तारा जग तारिणी।
छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी॥

केहरि वाहन सोह भवानी।
लांगुर वीर चलत अगवानी॥

कर में खप्पर खड्ग विराजे।
जाको देख काल डर भाजे॥

सोहै अस्त्र और त्रिशूला।
जाते उठत शत्रु हीयो सूला॥

नगरकोट में तुम्हीं विराजत।
तिहुं लोक में डंका बाजत॥

शुंभ निशुंभ दानव तुम मारे।
रक्तबीज शंखन संहारे॥

महिषासुर नृप अति अभिमानी।
जेहि अघ भार मही अकुलानी॥

रूप कराल कालिका धारा।
सेन सहित तुम तिहि संहारा॥

परी गाढ़ संतन पर जब जब।
भई सहाय मातु तुम तब तब॥

अमरपुरी अरु बासव लोका।
तब महिमा सब रहें अशोका॥

ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी।
तुम्हें सदा पूजें नर-नारी॥

प्रेम भक्ति से जो यश गावें।
दुःख दारिद्र निकट नहिं आवें॥

ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई।
जन्म मरन तिनकी छुट जाई॥

जोगी सुर मुनि कहत पुकारी।
योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी॥

शंकर आचारज तप कीनो।
काम अरु क्रोध जीति सब लीनो॥

निशिदिन ध्यान धरो शंकर को।
काहु काल नहिं सुमिरो तुमको॥

शक्ति रूप का मरम न पायो।
शक्ति गई तब मन पछतायो॥

शरणागत हुई कीर्ति बखानी।
जय जय जय जगदम्ब भवानी॥

भई प्रकट कृपा तुम करि माई।
शंकर के तब कष्ट मिटाई॥

श्री महाकाल काली के रूपा।
जगत मातु तेरा यहि स्वरूपा॥

श्री महाकाल काली के रूपा।
जगत मातु तेरा यहि स्वरूपा॥

जो कोई यह पढ़े स्तुति हमारी।
तारे संकट होय सुखारी॥

॥दोहा॥
धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे।
शक्ति रूप को सुमिरन लावे॥

कहैं अष्टमी को कीजै पूजन।
सदा रहें मम कृपा सुबोजन॥

महाकाली चालीसा के लाभ

  1. भय का नाश: महाकाली चालीसा का पाठ करने से सभी प्रकार के भय और चिंता का नाश होता है।
  2. शत्रु पर विजय: शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है।
  3. संकटों से मुक्ति: जीवन के सभी संकटों से मुक्ति मिलती है।
  4. सकारात्मक ऊर्जा: जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
  5. आध्यात्मिक उन्नति: आध्यात्मिक उन्नति और आत्मा की शुद्धि होती है।
  6. स्वास्थ्य लाभ: शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार होता है।
  7. परिवार में शांति: परिवार में शांति और सौहार्द्र बना रहता है।
  8. धन और समृद्धि: आर्थिक समृद्धि और धन की प्राप्ति होती है।
  9. मन की शांति: मानसिक शांति और स्थिरता प्राप्त होती है।
  10. सभी इच्छाओं की पूर्ति: भक्तों की सभी इच्छाओं की पूर्ति होती है।
  11. सद्गुणों की वृद्धि: जीवन में सद्गुणों की वृद्धि होती है।
  12. बाधाओं का निवारण: जीवन में आने वाली बाधाओं का निवारण होता है।
  13. शक्ति और साहस: शक्ति और साहस में वृद्धि होती है।
  14. मृत्यु के भय का नाश: मृत्यु के भय का नाश होता है।
  15. सदगति प्राप्ति: मृत्यु के बाद सदगति प्राप्त होती है।
  16. कष्टों का निवारण: जीवन के कष्टों का निवारण होता है।
  17. अशुभ शक्तियों से बचाव: अशुभ शक्तियों और बुरी नज़र से बचाव होता है।
  18. विवाह में अड़चनें दूर होती हैं: विवाह में आने वाली अड़चनें दूर होती हैं।
  19. बच्चों के स्वास्थ्य में सुधार: बच्चों के स्वास्थ्य में सुधार होता है।
  20. माता की कृपा: महाकाली की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

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महाकाली चालीसा पाठ विधि (दिन, अवधि, मुहूर्त)

दिन: महाकाली चालीसा का पाठ विशेष रूप से मंगलवार और शनिवार के दिन किया जाता है, क्योंकि यह दिन देवी काली को समर्पित माने जाते हैं।

अवधि: यह पाठ लगभग 15-20 मिनट का होता है। इसे प्रातः काल और सायं काल में करना उत्तम होता है।

मुहूर्त:

  1. प्रातः काल: सूर्योदय के समय (सुबह 4 से 6 बजे के बीच)।
  2. सायं काल: सूर्यास्त के समय (शाम 6 से 8 बजे के बीच)।

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महाकाली चालीसा विधि

  • स्नान: सबसे पहले स्नान करें और स्वच्छ कपड़े पहनें।
  • स्थान: पूजा के लिए एक शांत और स्वच्छ स्थान चुनें।
  • आसन: किसी आसन पर बैठ जाएं (कुशासन या सफेद वस्त्र का आसन)।
  • दीप जलाएं: दीपक जलाएं और कुछ धूप या अगरबत्ती जलाएं।
  • पूजा सामग्री: फूल, अक्षत (चावल), चंदन, और नैवेद्य (प्रसाद) रखें।
  • महाकाली मंत्र: सबसे पहले महाकाली मंत्र का 3 बार जाप करें।
  • चालीसा पाठ: फिर महाकाली चालीसा का पाठ करें।
  • आरती: पाठ समाप्त होने के बाद आरती करें और प्रसाद वितरण करें।
  • प्रणाम: अंत में माता महाकाली को प्रणाम करें और अपनी प्रार्थना रखें।

Santoshi Mata Chalisa paath for peace & prosperity

Santoshi Mata Chalisa paath for peace & prosperity

संतोषी माता को हिंदू धर्म में संतोष, सुख और शांति की देवी के रूप में पूजा जाता है। वे संतोष और संतुष्टि का प्रतीक हैं और माना जाता है कि उनकी पूजा से भक्तों की सभी इच्छाएँ पूरी होती हैं। संतोषी माता का स्वरूप बहुत ही सौम्य और दिव्य होता है। वे एक हाथ में तलवार और दूसरे हाथ में त्रिशूल धारण करती हैं। उनका वाहन सिंह है और वे एक कमल के आसन पर विराजमान होती हैं। उनकी पूजा विशेष रूप से शुक्रवार के दिन की जाती है और संतोषी माता व्रत कथा के माध्यम से उनकी महिमा का गुणगान किया जाता है।

संतोषी माता चालीसा

॥दोहा॥

वंदौ मातु संतोषी चित स्वरूप विशाल।
विघ्न हरण मंगल करन जय जय जगवंदाल॥

॥चौपाई॥

जय जय संतोषी माता।
जग जननी सुखदाता॥

विनय करत कर जोरि।
संतोषी राखौ मोरि॥

जयति जयति जगदंबा।
दुख हरण सुख संपदा॥

त्रिभुवन में है प्रकाश।
तुम्हरो निर्मल हास॥

पावन रूप अनूपा।
मनहर मंगलमूला॥

जगत कष्ट का हारी।
तुम हो कल्याण कारी॥

मंगल करन कृपाला।
संतोषी सुख माला॥

शरणागत की रक्षा।
करत सदा तुम साक्षा॥

निर्धन की तुम साथी।
निर्बल की बलदाता॥

विनय करूं मैं माता।
मोर मनोरथ पूरन॥

जय जग जननी दयाला।
तुम हो कृपा निधि माला॥

संतोषी मैया प्यारी।
तुम हो सुख की धारा॥

दुख हरण मंगल कारी।
पाप ताप विधि हारी॥

मन में भक्ति जगायौ।
तुमने संतोष दिलायौ॥

सर्व मनोरथ पूरन।
करहु कृपा करुना मूरन॥

व्रत ध्यान आराधन।
संकट हरण सुबोधन॥

पूजन में रत रहौं।
तुम्हरी कृपा पावौं॥

संतोषी मैया मेरी।
तुम बिन दुखिया देरी॥

पूर्ण करो मन कामना।
मुक्त करौ सब शामना॥

कृपा करौ जगदंबा।
सुख संपदा तुम सांबा॥

दीनन की दुख हारी।
तुम हो कल्याण कारी॥

जय जय संतोषी माता।
तुम हो सुख संपदा।

॥दोहा॥

भक्ति प्रेम से मातु के, जो यह पाठ करै।
संतोषी सुख संपदा, सदा सर्वदा भरै॥

संतोषी माता चालीसा के लाभ

  1. संतोष की प्राप्ति: संतोषी माता चालीसा का नियमित पाठ करने से जीवन में संतोष और शांति मिलती है।
  2. मन की शांति: मानसिक शांति और स्थिरता प्राप्त होती है।
  3. सुख-समृद्धि: परिवार में सुख और समृद्धि का संचार होता है।
  4. सभी इच्छाओं की पूर्ति: भक्तों की सभी इच्छाओं की पूर्ति होती है।
  5. आर्थिक संकटों से मुक्ति: आर्थिक संकटों से मुक्ति मिलती है और धन की प्राप्ति होती है।
  6. रोगों से मुक्ति: शारीरिक और मानसिक रोगों से मुक्ति मिलती है।
  7. संकटों से बचाव: जीवन के सभी संकटों से बचाव होता है।
  8. सकारात्मक ऊर्जा: जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
  9. आध्यात्मिक उन्नति: आध्यात्मिक उन्नति और आत्मा की शुद्धि होती है।
  10. परिवार में शांति: परिवार में शांति और सौहार्द्र बना रहता है।
  11. सद्गुणों की वृद्धि: जीवन में सद्गुणों की वृद्धि होती है।
  12. बाधाओं का निवारण: जीवन में आने वाली बाधाओं का निवारण होता है।
  13. शत्रुओं पर विजय: शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है।
  14. भय का नाश: जीवन में भय और चिंता का नाश होता है।
  15. धैर्य की वृद्धि: धैर्य और सहनशीलता की वृद्धि होती है।
  16. विवाह में अड़चनें दूर होती हैं: विवाह में आने वाली अड़चनें दूर होती हैं।
  17. बच्चों के स्वास्थ्य में सुधार: बच्चों के स्वास्थ्य में सुधार होता है।
  18. मित्रों और रिश्तेदारों का सहयोग: मित्रों और रिश्तेदारों का सहयोग मिलता है।
  19. सुखद भविष्य: भविष्य की चुनौतियों का सामना करने की शक्ति मिलती है।
  20. संतोषी माता की कृपा: संतोषी माता की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

पाठ विधि (दिन, अवधि, मुहूर्त)

दिन: संतोषी माता चालीसा का पाठ विशेष रूप से शुक्रवार के दिन किया जाता है, क्योंकि यह दिन माता को समर्पित है।

अवधि: यह पाठ लगभग 15-20 मिनट का होता है। इसे प्रातः काल और सायं काल में करना उत्तम होता है।

मुहूर्त:

  1. प्रातः काल: सूर्योदय के समय (सुबह 4 से 6 बजे के बीच)।
  2. सायं काल: सूर्यास्त के समय (शाम 6 से 8 बजे के बीच)।

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संतोषी माता चालीसा विधि

  1. स्नान: सबसे पहले स्नान करें और स्वच्छ कपड़े पहनें।
  2. स्थान: पूजा के लिए एक शांत और स्वच्छ स्थान चुनें।
  3. आसन: किसी आसन पर बैठ जाएं (कुशासन या सफेद वस्त्र का आसन)।
  4. दीप जलाएं: दीपक जलाएं और कुछ धूप या अगरबत्ती जलाएं।
  5. पूजा सामग्री: फूल, अक्षत (चावल), चंदन, और नैवेद्य (प्रसाद) रखें।
  6. संतोषी माता मंत्र: सबसे पहले संतोषी माता मंत्र का 3 बार जाप करें।
   ॐ ऐं ह्रीं संतोषेश्वरी क्लीं नमः॥
  1. चालीसा पाठ: फिर संतोषी माता चालीसा का पाठ करें।
  2. आरती: पाठ समाप्त होने के बाद आरती करें और प्रसाद वितरण करें।
  3. प्रणाम: अंत में माता संतोषी को प्रणाम करें और अपनी प्रार्थना रखें।

संतोषी माता चालीसा का नियमित पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में शुभता, शांति और समृद्धि का संचार होता है।

Annapurna chalisa paath for prosperity

Annapurna chalisa paath for prosperity

माता अन्नपूर्णा को हिंदू धर्म में भोजन और पोषण की देवी के रूप में पूजा जाता है। उनका नाम ‘अन्नपूर्णा’ दो शब्दों ‘अन्न’ (भोजन) और ‘पूर्णा’ (भरपूर) से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है “जो भोजन से भरपूर है”। वे भगवान शिव की पत्नी पार्वती का एक रूप हैं और ऐसा माना जाता है कि वे सभी प्राणियों को भोजन और पोषण प्रदान करती हैं।

माता अन्नपूर्णा का स्वरूप अति दिव्य और सुंदर होता है। वे एक हाथ में अनाज का पात्र (अन्न से भरा हुआ कटोरा) और दूसरे हाथ में एक चम्मच (अन्न वितरण हेतु) धारण करती हैं। उनका चेहरा सौम्य और करुणा से परिपूर्ण होता है। उनकी पूजा विशेष रूप से नवरात्रि और अन्नकूट पर्व के दौरान की जाती है।

अन्नपूर्णा चालीसा

॥दोहा॥

जग जननी जय अन्नपूर्णा, जग अन्ना की खान।
जो जन तेरा नाम ले, ता को तजै न धान॥

॥चौपाई॥
जय जय अन्नपूर्णा जग जननी। 
सकल अनादि सृष्टि जन धनी॥

शैलराज तनया भवानी। 
तजि शंकर रूप महरानी॥

कनक भूषण तन सुंदर। 
सजी सर्व सिंगार समुंदर॥

दसन महा उज्जवल सुतारी। 
पारद हिय मंगल करनी॥

अधर महा रुचिर उक्ति प्यारी। 
धनुष अनल वाही शमशानी॥

दिव्य देह महा सौरभ धारा। 
संजीवनी परशु दुख हारा॥

नीलकंठ रूप हरि बाना। 
जगत तारण गिरीजा नाना॥

दोहा॥

नित्य निरंतर भोजन, जग मा तैं वितरण।
तृप्ति पा यश गावत, सब ही तेरा गुन॥

॥चौपाई॥

शुद्ध भाव से जो जन गावें। 
सकल मनोरथ फल पावें॥

जग जननी निज संकट हारी। 
रखै सदा जयती बनवारी॥

धूप दीप नवैद्य चढ़ावें। 
सकल मनोरथ फल पावें॥

अन्नपूर्णा जय जग माते। 
अन्य देह तन वासर रातें॥

तुमहि सर्व स्वरूप दिखाना। 
मन महा मै मातु ठिकाना॥

जो यह अन्नपूर्णा चालीसा। 
सत्य साकार होइ जग ईशा॥

सकल भूख सब ता की मेटें। 
मंगल महा समृद्धि अरु हेतें॥

॥दोहा॥

भूख प्यास सब मेटि कै, जो यह चालीसा गावे।
अन्नपूर्णा जगदंबिका, तृप्ति सदा सुख पावे॥

अन्नपूर्णा चालीसा के लाभ

1. भोजन की कमी नहीं होती: जो लोग नियमित रूप से अन्नपूर्णा चालीसा का पाठ करते हैं, उनके घर में कभी भी भोजन की कमी नहीं होती।
2. धन और समृद्धि: आर्थिक समृद्धि और धन की प्राप्ति होती है।
3. भूख और प्यास का निवारण: भूख और प्यास की समस्या से मुक्ति मिलती है।
4. परिवार में सुख-शांति: परिवार में शांति और सौहार्द्र बना रहता है।
5. सकारात्मक ऊर्जा: जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
6. स्वास्थ्य लाभ: शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार होता है।
7. कष्टों से मुक्ति: जीवन के कष्टों और समस्याओं से मुक्ति मिलती है।
8. अन्न और धान्य की वृद्धि: घर में अन्न और धान्य की वृद्धि होती है।
9. मानसिक शांति: मानसिक शांति और स्थिरता मिलती है।
10. आध्यात्मिक उन्नति: आध्यात्मिक विकास और आत्मा की शुद्धि होती है।
11. शत्रुओं पर विजय: शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है।
12. स्मरण शक्ति: स्मरण शक्ति में वृद्धि होती है।
13. सुखद भविष्य: भविष्य की चुनौतियों का सामना करने की शक्ति मिलती है।
14. मनोबल में वृद्धि: मनोबल और आत्मविश्वास बढ़ता है।
15. सद्गति प्राप्ति: मृत्यु के बाद सद्गति प्राप्त होती है।
16. प्राकृतिक आपदाओं से रक्षा: प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षा होती है।
17. शुभ फल प्राप्ति: सभी शुभ फलों की प्राप्ति होती है।
18. अच्छी संगति: अच्छे लोगों की संगति मिलती है और बुरी संगति से बचाव होता है।
19. अन्नपूर्णा देवी की कृपा: देवी अन्नपूर्णा की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
20. अन्नपूर्णा चालीसा के लाभ

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अन्नपूर्णा चालीसा पाठ विधि (दिन, अवधि, मुहूर्त)

दिन: अन्नपूर्णा चालीसा का पाठ किसी भी दिन किया जा सकता है, लेकिन सोमवार और शुक्रवार विशेष रूप से शुभ माने जाते हैं।

अवधि: यह पाठ लगभग 15-20 मिनट का होता है। इसे प्रातः काल और सायं काल में करना उत्तम होता है।

मुहूर्त:
1. प्रातः काल: सूर्योदय के समय (सुबह 4 से 6 बजे के बीच)।
2. सायं काल: सूर्यास्त के समय (शाम 6 से 8 बजे के बीच)।

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अन्नपूर्णा चालीसा विधि

1. स्नान: सबसे पहले स्नान करें और स्वच्छ कपड़े पहनें।
2. स्थान: पूजा के लिए एक शांत और स्वच्छ स्थान चुनें।
3. आसन: किसी आसन पर बैठ जाएं (कुशासन या सफेद वस्त्र का आसन)।
4. दीप जलाएं: दीपक जलाएं और कुछ धूप या अगरबत्ती जलाएं।
5. पूजा सामग्री: फूल, अक्षत (चावल), चंदन, और नैवेद्य (प्रसाद) रखें।
6. अन्नपूर्णा मंत्र: सबसे पहले अन्नपूर्णा मंत्र का 3 बार जाप करें।जीवन में सद्गुणों की वृद्धि होती है।

ॐ अन्नपूर्णे सदापूर्णे शङ्करप्राणवल्लभे।
ज्ञानवैराग्यसिद्ध्यर्थं भिक्षां देहि च पार्वति॥

  1. चालीसा पाठ: फिर अन्नपूर्णा चालीसा का पाठ करें।
  2. आरती: पाठ समाप्त होने के बाद आरती करें और प्रसाद वितरण करें।
  3. प्रणाम: अंत में माता अन्नपूर्णा को प्रणाम करें और अपनी प्रार्थना रखें।

अन्नपूर्णा चालीसा का नियमित पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में शुभता, शांति और समृद्धि का संचार होता है।

Gayatri gupta chalisa paath for peace & moksha

Gayatri gupta chalisa paath for peace & moksha

गायत्री चालीसा का नियमित पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में शुभता, शांति और समृद्धि का संचार होता है।

चालीसा

गायत्री चालीसा एक लोकप्रिय धार्मिक पाठ है जिसमें 40 चौपाइयाँ होती हैं। इसे नियमित रूप से पढ़ने से व्यक्ति को मानसिक शांति, सकारात्मकता और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।

ॐ श्री गणेशाय नमः ॥
श्री गायत्री चालीसा

जयति जयति जय गायत्री माता।
सद्गुण सद्भाव सुमति विधाता॥

त्रिपदात्रय महाशक्ति धारी।
सर्व जगत की त्राता तुम्हारी॥

सप्त स्वरूपा षड्भुजा वाली।
सकल विश्व की हो रखवाली॥

धूप दीप नैवेद्य चढ़ाऊँ।
सुमन पत्र से तुम्हे मनाऊँ॥

शुद्ध बुद्धि औ निर्मल मानस।
होवे तुम्हारी कृपा प्रभामय॥

अखिल विश्व निवासिनी माता।
दया दृष्टि से सब सुखदाता॥

वेद त्रयी मम मंत्र पुनीता।
जाप करूँ मैं यथा पुनीता॥

रोग शोक दारिद्र्य मिटावे।
अघ अज्ञान मोह भ्रम हटावे॥

सर्व पाप नष्ट कर डारे।
सर्व दुःख संताप निवारे॥

शुद्ध सत्त्वगुण साधक प्राणी।
धारण करैं अहो वर दानी॥

लक्ष्मी वीणा वर कर धारण।
विपुल धर्म उपकार निवर्तन॥

त्रिपदा सुरसरिता सुखकारी।
शांति प्रज्ञा नीतिनियारी॥

अक्षर चौबीसहिं निज ध्यावा।
जपे नित्य श्रद्धा मन लावा॥

सिद्ध मंत्र जो वेदन रचायो।
महर्षि विश्वामित्र पठायो॥

संपुट पाठ करौं मन लाई।
ध्यान धारि जोशी जप जाई॥

पाठ करौं शुभ संगति साजे।
सकल मनोरथ होय समाजे॥

गायत्री जय जय जप मांही।
पारस मणि समान गुण सांहीं॥

त्राहि त्राहि संकट हरना।
विषम सम संकट को टरना॥

प्रेम सहित निज काज सवारौ।
सकल विघ्न बाधा विनिवारौ॥

मंगल कामना पूरन करिहौं।
दुर्वासना दुष्कर्म टरिहौं॥

सद्गति सुखमय जीव बनायौ।
सकल अघा निदान मिटायौ॥

कामधेनु तुल्य अति सुखकारी।
विष्णुप्रिया ब्रह्माणी माया॥

गायत्री महिमा अति भारी।
जो सत्संगी सो सुखकारी॥

पाठ करै जो मन अनुमाना।
सो पावे धन जन्म निराना॥

सकल कामना ताहि सिद्धि होई।
धर्म नीरस सब संताप खोई॥

साधक सुलभ कष्ट औ दुख नाहीं।
जो यह मंत्र निधि मनमानी॥

सिद्ध साधिका तीनो काल।
पाठ करै सो पावे उरमाल॥

सर्वज्ञ समरथ यह वरदानी।
त्रय तप जापक पुण्यरानी॥

स्वरचित यह चालीसा पद।
जो नर नारी नित्य करै मन।

मन इच्छित फल सो पावै।
कभी न संकटकाल सतावै॥

चतुर्वेद प्रमाण पुराण।
शुभ सुकृत तिथि पावन मान॥

अति पुण्य यह पाठ जो जावे।
निरखत ही फल जाति लावे॥

गायत्री जयति जयति भगवती।
सत्सुकृत पुण्य सुमति सुनीति॥

गायत्री चालीसा के लाभ

  1. मानसिक शांति: गायत्री चालीसा का पाठ करने से मन में शांति और स्थिरता आती है।
  2. ध्यान केंद्रित करना: नियमित रूप से पाठ करने से ध्यान केंद्रित करने की शक्ति बढ़ती है।
  3. नकारात्मक ऊर्जा से बचाव: नकारात्मक ऊर्जा और बुरी दृष्टि से रक्षा होती है।
  4. सकारात्मकता: जीवन में सकारात्मकता का संचार होता है।
  5. आध्यात्मिक उन्नति: आध्यात्मिक विकास और आत्मा की शुद्धि होती है।
  6. बुद्धि विकास: बुद्धि की वृद्धि होती है और समझ बढ़ती है।
  7. स्वास्थ्य लाभ: मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार होता है।
  8. धन वृद्धि: आर्थिक स्थिति में सुधार और धन की प्राप्ति होती है।
  9. परिवार में सुख-शांति: परिवार में सुख-शांति और सौहार्द्र बना रहता है।
  10. संकटों से मुक्ति: जीवन में आने वाले संकटों से मुक्ति मिलती है।
  11. धार्मिक लाभ: धार्मिक और पुण्य कर्मों में वृद्धि होती है।
  12. शत्रु पर विजय: शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है।
  13. वास्तु दोष निवारण: घर में वास्तु दोष निवारण होता है।
  14. कार्य में सफलता: हर कार्य में सफलता प्राप्त होती है।
  15. स्मरण शक्ति: स्मरण शक्ति में वृद्धि होती है।
  16. सुखद भविष्य: भविष्य की चुनौतियों का सामना करने की शक्ति मिलती है।
  17. मनोबल में वृद्धि: मनोबल और आत्मविश्वास बढ़ता है।
  18. पापों से मुक्ति: जीवन के पापों से मुक्ति मिलती है।
  19. शुभ फल प्राप्ति: सभी शुभ फलों की प्राप्ति होती है।
  20. अच्छी संगति: अच्छे लोगों की संगति मिलती है और बुरी संगति से बचाव होता है।

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पाठ विधि (दिन, अवधि, मुहूर्त)

दिन: गायत्री चालीसा का पाठ किसी भी दिन किया जा सकता है, लेकिन रविवार और गुरुवार विशेष रूप से शुभ माने जाते हैं।

अवधि: यह पाठ लगभग 10-15 मिनट का होता है। इसे ४० दिन तक सूर्योदय और सूर्यास्त के समय करना उत्तम होता है।

मुहूर्त:

  1. प्रातः काल: सूर्योदय के समय (सुबह 4 से 6 बजे के बीच)।
  2. सायं काल: सूर्यास्त के समय (शाम 6 से 8 बजे के बीच)।

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विधि:

  1. स्नान: सबसे पहले स्नान करें और स्वच्छ कपड़े पहनें।
  2. स्थान: पूजा के लिए एक शांत और स्वच्छ स्थान चुनें।
  3. आसन: किसी आसन पर बैठ जाएं (कुशासन या सफेद वस्त्र का आसन)।
  4. दीप जलाएं: दीपक जलाएं और कुछ धूप या अगरबत्ती जलाएं।
  5. पूजा सामग्री: फूल, अक्षत (चावल), चंदन, और नैवेद्य (प्रसाद) रखें।
  6. गायत्री मंत्र: सबसे पहले गायत्री मंत्र का 3 बार जाप करें।
   ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यम्।
   भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्॥
  1. चालीसा पाठ: फिर गायत्री चालीसा का पाठ करें।
  2. आरती: पाठ समाप्त होने के बाद आरती करें और प्रसाद वितरण करें।
  3. प्रणाम: अंत में माँ गायत्री को प्रणाम करें और अपनी प्रार्थना रखें।

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कनकधारा स्तोत्र, जिसे आदि शङ्कराचार्य ने रचा है, भगवान लक्ष्मी की कृपा और आशीर्वाद को प्राप्त करने के लिए प्रार्थना करता है। इस स्तोत्र को पढ़ने से माता लक्ष्मी की कृपा मिलती है और धन, समृद्धि, और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। यहां कनकधारा स्तोत्र का पाठ दिया जा रहा है:

महत्व

कनकधारा लक्ष्मी स्तोत्र आदिशंकराचार्य द्वारा रचित एक अत्यंत प्रभावशाली स्तोत्र है। यह स्तोत्र माँ लक्ष्मी की स्तुति करता है और इसके पाठ से व्यक्ति के जीवन में सुख, समृद्धि और धन की प्राप्ति होती है।

स्तोत्र

  • 1 अंगं हरेः पुलकभूषणमाश्रयन्ती
    भृंगाङ्गनेव मुकुलाभरणं तमालम्।
    अंगीकृताखिलविभूतिरपाङ्गलीला
    माङ्गल्यदास्तु मम मङ्गलदेवतायाः॥1॥
  • 2 मुग्धा मुहुर्विदधती वदने मुरारेः
    प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि।
    मालादृशोर्मधुकरीव महोत्पले या
    सा मे श्रियं दिशतु सागरसम्भवायाः॥2॥
  • 3 विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदानदक्ष-
    मानन्दहेतुरधिकं मुरविद्विषोऽपि।
    ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्ध-
    मिन्दीवरोदरसहोदरमिन्दिरायाः॥3॥
  • 4 आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्दं
    आनन्दकन्दमनिमेषमनङ्गतन्त्रम्।
    आकेकरस्थितकनीनिकपक्ष्मनेत्रं
    भूत्याम्बुजं मम भवत्कणिकावदातम्॥4॥
  • 5 बाह्वन्तरे मधुजितः श्रितकौस्तुभे या
    हारावलीव हरिनीलमयी विभाति।
    कामप्रदा भगवतोऽपि कटाक्षमाला
    कल्याणमावहतु मे कमलालयायाः॥5॥
  • 6 कालाम्बुदालिललितोरसि कैटभारेः
    धाराधरे स्फुरति या तडिदङ्गनेव।
    मातुः समस्तजगतां महनीयमूर्तिः
    भद्राणि मे दिशतु भार्गवनन्दनायाः॥6॥
  • 7 प्राप्तं पदं प्रथमतः किल यत्प्रभावान्
    माङ्गल्यभाजि मधुमाथिनि मन्मथेन।
    मय्यापतेत्तदिह मन्थरमीक्षणार्धं
    मन्दालसं च मकरालयकन्यकायाः॥7॥
  • 8 दद्याद्दयानुपवनो द्रविणाम्बुधारां
    अस्मिन्नकिञ्चनविहङ्गशिशौ विषण्णे।
    दुष्कर्मधर्ममपनीय चिराय दूरं
    नारायणप्रणयिनी नयनाम्बुवाहः॥8॥
  • 9 गीर्देवतेति गरुडध्वजसुन्दरीति
    शाकम्भरीति शशिशेखरवल्लभेति।
    सृष्टिस्थितिप्रलयकेलिषु संस्थितायै
    तस्यै नमस्त्रिभुवनैकगुरोस्तरुण्यै॥9॥
  • 10 श्रुत्यै नमोऽस्तु शुभकर्मफलप्रसूत्यै
    रत्यै नमोऽस्तु रमणीयगुणार्णवायै।
    शक्त्यै नमोऽस्तु शतपत्रनिकेतनायै
    पुष्ट्यै नमोऽस्तु पुरुषोत्तमवल्लभायै॥10॥
  • 11 नमोऽस्तु नालीकनिभाननायै
    नमोऽस्तु दुग्धोदधिजन्मभूत्यै।
    नमोऽस्तु सोमामृतसोदरायै
    नमोऽस्तु नारायणवल्लभायै॥11॥
  • 12 नमोऽस्तु हेमाम्बुजपीठिकायै
    नमोऽस्तु भूमण्डलनायिकायै।
    नमोऽस्तु देवादिदयापरायै
    नमोऽस्तु शार्ङ्गायुधवल्लभायै॥12॥
  • 13 नमोऽस्तु देव्यै भृगुनन्दनायै
    नमोऽस्तु विष्णोरुरसि स्थितायै।
    नमोऽस्तु लक्ष्म्यै कमलालयायै
    नमोऽस्तु दामोदरवल्लभायै॥13॥
  • 14 नमोऽस्तु कान्त्यै कमलेक्षणायै
    नमोऽस्तु भूत्यै भुवनप्रसूत्यै।
    नमोऽस्तु देवादिभिरर्चितायै
    नमोऽस्तु नन्दात्मजवल्लभायै॥14॥
  • 15 सम्पत्कराणि सकलेन्द्रियनन्दनानि
    साम्राज्यदानविभवानि सरोरुहाक्षि।
    त्वद्वन्दनानि दुरिताहरणोद्यतानि
    मामेव मातरनिशं कलयन्तु मान्ये॥15॥
  • 16 यत्कटाक्षसमुपासनाविधिः
    सेवकस्य सकलार्थसम्पदः।
    सन्तनोति वचनाङ्गमानसैः
    त्वां मुरारिहृदयेश्वरीं भजे॥16॥
  • 17 सरसिजनिलये सरोजहस्ते
    धवलतमांशुकगन्धमाल्यशोभे।
    भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे
    त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम्॥17॥
  • 18 दिग्घस्तिभिः कनककुम्भमुखावसृष्ट-
    स्वर्वाहिनीविमलचारुजलप्लुताङ्गीम्।
    प्रातर्नमामि जगतां जननीमशेष-
    लोकाधिनाथगृहिणीममृताब्धिपुत्रीम्॥18॥
  • 19 कमले कमलाक्षवल्लभे त्वं
    करुणापूरतराङ्गितैरपाङ्गैः।
    अवलोकय मामकिञ्चनानां
    प्रथमं पात्रमकृत्रिमं दयायाः॥19॥
  • 20 देवि प्रसीद जगदीश्वरि लोकमातः
    कल्याणगात्रि कमलेक्षणजीवनाथे।
    दारिद्र्यभीतिहृदयं शरणागतं मां
    आलोकय प्रतिदिनं सदयैरपाङ्गैः॥20॥

कनकधारा लक्ष्मी स्तोत्र के लाभ

  1. धन-संपत्ति में वृद्धि: आर्थिक स्थिति में सुधार होता है।
  2. समृद्धि: जीवन में समृद्धि और भौतिक सुख की प्राप्ति होती है।
  3. संकट निवारण: जीवन के सभी संकटों का निवारण होता है।
  4. सौभाग्य: सौभाग्य और शुभता की प्राप्ति होती है।
  5. स्वास्थ्य में सुधार: शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार होता है।
  6. परिवार में सुख-शांति: परिवार में सुख और शांति बनी रहती है।
  7. व्यापार में उन्नति: व्यापार में वृद्धि और सफलता मिलती है।
  8. कर्ज से मुक्ति: कर्ज से मुक्ति मिलती है।
  9. शत्रु नाशक: शत्रुओं से रक्षा होती है।
  10. प्रसन्नता: मन प्रसन्न रहता है।
  11. विवाह में सफलता: विवाह संबंधी समस्याओं का समाधान होता है।
  12. बुद्धि और ज्ञान: बुद्धि और ज्ञान की वृद्धि होती है।
  13. संकल्प शक्ति: संकल्प शक्ति में वृद्धि होती है।
  14. सकारात्मकता: जीवन में सकारात्मकता आती है।
  15. संतान सुख: संतान सुख की प्राप्ति होती है।
  16. दीर्घायु: दीर्घायु और स्वस्थ जीवन की प्राप्ति होती है।
  17. मान-सम्मान: समाज में मान-सम्मान की प्राप्ति होती है।
  18. सद्गुण वृद्धि: सद्गुणों की वृद्धि होती है।
  19. आध्यात्मिक उन्नति: आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।
  20. विघ्न-बाधा निवारण: सभी प्रकार की विघ्न और बाधाओं का निवारण होता है।

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दिन, अवधि, और मुहूर्त

  • दिन: शुक्रवार और अक्षय तृतीया का दिन माँ लक्ष्मी की पूजा के लिए विशेष रूप से शुभ माना जाता है।
  • अवधि: कनकधारा लक्ष्मी स्तोत्र का पाठ नियमित रूप से 21 दिन तक किया जा सकता है। प्रतिदिन कम से कम एक बार इसका पाठ करना चाहिए।
  • मुहूर्त: ब्रह्म मुहूर्त (सुबह 4 बजे से 6 बजे के बीच) कनकधारा लक्ष्मी स्तोत्र के पाठ के लिए सर्वोत्तम समय है। इसके अतिरिक्त, सुबह और शाम के समय भी पाठ किया जा सकता है।

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कनकधारा लक्ष्मी स्तोत्र पाठ की विधि

  1. स्नान और स्वच्छ वस्त्र: स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  2. स्थान: एक साफ और शांत स्थान पर बैठें।
  3. दीप जलाना: एक दीपक जलाकर माँ लक्ष्मी की मूर्ति या चित्र के सामने रखें।
  4. संकल्प: अपने मन में संकल्प लें और माँ लक्ष्मी का ध्यान करें।
  5. आरंभ: ‘ॐ श्री महालक्ष्म्यै नमः’ से पाठ आरंभ करें।
  6. समाप्ति: ‘जय माँ लक्ष्मी’ से पाठ समाप्त करें।
  7. प्रसाद: पाठ के बाद माँ लक्ष्मी को नैवेद्य (प्रसाद) अर्पित करें और फिर उसे सभी में बांटें।
  8. आरती: अंत में माँ लक्ष्मी की आरती करें।

कनकधारा लक्ष्मी स्तोत्र का पाठ अत्यंत सरल और प्रभावी है। इसके पाठ से भक्तों को माँ लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है और उनके जीवन में सुख, समृद्धि और धन की वर्षा होती है। कनकधारा लक्ष्मी स्तोत्र का नियमित पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं और सभी प्रकार की समस्याओं का समाधान होता है।म्प्रदायः ।

Durga gupta chalisa paath for wealth & peace

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नियमित दुर्गा चालीसा का पाठ करने से माता दुर्गा की कृपा मिलती है. माता का पाठ करने के पहले एक माला दुर्गा मंत्र “॥ॐ दुं दुर्गे नमः॥” का जप करना चाहिये.

दुर्गा चालीसा का पाठ करने से माता दुर्गा की कृपा प्राप्त होती है और भक्त की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। यह चालीसा माता दुर्गा की प्रसन्नता और आशीर्वाद को प्राप्त करने में सहायक होती है। चालीसा का पाठ करने से भय, भ्रम और अज्ञानता का नाश होता है और व्यक्ति का मनोबल बढ़ता है।

यह पाठ मानसिक शांति, स्थिरता और सुख-समृद्धि की प्राप्ति में मदद करता है। दुर्गा चालीसा का पाठ करने से सभी प्रकार की संकट और कष्टों से मुक्ति मिलती है। इस चालीसा का पाठ करने से समस्त बुराइयों से मुक्ति मिलती है और जीवन में सफलता प्राप्त होती है। दुर्गा चालीसा का पाठ नियमित रूप से करने से व्यक्ति का मान-सम्मान बढ़ता है और उसका जीवन समृद्धि से भर जाता है।

महत्व

दुर्गा चालीसा माँ दुर्गा की स्तुति में रचित 40 पंक्तियों का भजन है। यह भजन उनके भक्तों द्वारा श्रद्धा और भक्ति के साथ गाया जाता है। दुर्गा चालीसा का नियमित पाठ करने से अनेक लाभ प्राप्त होते हैं।

दुर्गा चालीसा

दोहा:

नमो नमो दुर्गे सुख करनी।
नमो नमो अंबे दुख हरनी॥

निरंकार है ज्योति तुम्हारी।
तिहूं लोक फैली उजियारी॥

शशि ललाट मुख महा विसाला।
नेत्र लाल भृकुटि विकराला॥

रूप मातु को अधिक सुहावे।
दरश करत जन अति सुख पावे॥

तुम संसार शक्ति लय कीना।
पालन हेतु अन्न धन दीना॥

अन्नपूर्णा हुई जग पाला।
तुम ही आदि सुंदरी बाला॥

प्रलय काल सब नाशन हारी।
तुम गौरी शिव शंकर प्यारी॥

शिव योगी तुम्हरे गुण गावें।
ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें॥

रूप सरस्वती को तुम धारा।
देश साक्षर सब जग सारा॥

कहते हैं वेद तुम्हें महिमा-मंडित।
महाशक्ति परमेश्वरी वंदित॥

महा लक्ष्मी तुम्हें कहते हैं।
महाकाली स्वरूप लवाते हैं॥

ध्यान धरें शुम्भ-निशुम्भ विधारी।
महिषासुर नृप अति अभिमानी॥

रक्तबीज संहार किया तुमने।
शक्ति में अपने नाश किया तुमने॥

मधु कैटभ को बलि लावें।
चण्ड-मुण्ड संहारे तुम आपने॥

धूम्र विलोचन जब हाथ धारा।
राक्षस संहार किया तुमने सारा॥

दुःखियों का दुख हरने वाली।
सुख संपत्ति के हर्षण वाली॥

ध्यान ध्यान धरें जो तुम्हारा।
तिन के काज बिगड़त सवारा॥

शुभ-लाभ की वर्षा करती।
सद्गुण समृद्धि से संपन्न करती॥

धर्म का मार्ग सिखाने वाली।
अधर्म का नाश करने वाली॥

रक्षक वीर बलशाली सारे।
शक्ति तुम्हारी हरदम संभाले॥

व्यापार धंधा जो भी करता।
ध्यान तुम्हारा ध्यान जो धरता॥

कार्य में उसका सुख सब पूरण।
कोई विपत्ति में नहिं भोगे दुःख शरण॥

नमो नमो दुर्गे सुख करनी।
नमो नमो अंबे दुख हरनी॥

लाभ

  1. संकट निवारण: जीवन के सभी संकटों का निवारण होता है।
  2. स्वास्थ्य में सुधार: शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार होता है।
  3. आध्यात्मिक उन्नति: आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।
  4. शत्रु नाशक: शत्रुओं से रक्षा होती है।
  5. धन-संपत्ति में वृद्धि: आर्थिक स्थिति में सुधार होता है।
  6. मानसिक शांति: मानसिक शांति और संतोष प्राप्त होता है।
  7. परिवार में सुख-शांति: परिवार में सुख और शांति बनी रहती है।
  8. सफलता: कार्यों में सफलता मिलती है।
  9. भय से मुक्ति: सभी प्रकार के भय से मुक्ति मिलती है।
  10. ज्ञान और विवेक: ज्ञान और विवेक की प्राप्ति होती है।
  11. संकल्प शक्ति: संकल्प शक्ति में वृद्धि होती है।
  12. सकारात्मकता: जीवन में सकारात्मकता आती है।
  13. रोगों का नाश: सभी प्रकार के रोगों का नाश होता है।
  14. प्रसन्नता: मन प्रसन्न रहता है।
  15. अखंड भक्ति: माँ दुर्गा की अखंड भक्ति प्राप्त होती है।
  16. प्राकृतिक आपदाओं से रक्षा: प्राकृतिक आपदाओं से रक्षा होती है।
  17. समस्याओं का समाधान: जीवन की सभी समस्याओं का समाधान होता है।
  18. कर्ज से मुक्ति: कर्ज से मुक्ति मिलती है।
  19. संतान सुख: संतान सुख की प्राप्ति होती है।
  20. दीर्घायु: दीर्घायु और स्वस्थ जीवन की प्राप्ति होती है।

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दिन, अवधि, और मुहूर्त

  • दिन: नवरात्रि और शुक्रवार का दिन माँ दुर्गा की पूजा के लिए विशेष रूप से शुभ माना जाता है।
  • अवधि: दुर्गा चालीसा का पाठ नियमित रूप से 21 दिन तक किया जा सकता है। प्रतिदिन कम से कम एक बार इसका पाठ करना चाहिए।
  • मुहूर्त: ब्रह्म मुहूर्त (सुबह 4 बजे से 6 बजे के बीच) दुर्गा चालीसा के पाठ के लिए सर्वोत्तम समय है। इसके अतिरिक्त, सुबह और शाम के समय भी पाठ किया जा सकता है।

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दुर्गा चालीसा पाठ की विधि

  1. स्नान और स्वच्छ वस्त्र: स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  2. स्थान: एक साफ और शांत स्थान पर बैठें।
  3. दीप जलाना: एक दीपक जलाकर माँ दुर्गा की मूर्ति या चित्र के सामने रखें।
  4. संकल्प: अपने मन में संकल्प लें और माँ दुर्गा का ध्यान करें।
  5. आरंभ: ‘ॐ दुर्गाय नमः’ और ‘श्री दुर्गाय नमः’ से पाठ आरंभ करें।
  6. समाप्ति: ‘जय माता दी’ से पाठ समाप्त करें।
  7. प्रसाद: पाठ के बाद माँ दुर्गा को नैवेद्य (प्रसाद) अर्पित करें और फिर उसे सभी में बांटें।
  8. आरती: अंत में माँ दुर्गा की आरती करें।

दुर्गा चालीसा का पाठ अत्यंत सरल और प्रभावी है। इसके पाठ से भक्तों को माँ दुर्गा की कृपा प्राप्त होती है और उनके जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है। दुर्गा चालीसा का नियमित पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं और सभी प्रकार की समस्याओं का समाधान होता है।

Shiva chalisa gupta paath for family peace

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ग्रहस्थ जीवन को सफल बनाने वाली श्री शिव चालीसा का पाठ करने से मानसिक शांति, ध्यान, और आत्मिक उन्नति होती है। शिव चालीसा महादेव की महिमा और गुणों का वर्णन करती है और उन्हें प्रसन्न करने का प्रयास करती है। इस चालीसा के पाठ से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है और उनका आशीर्वाद मिलता है। यह चालीसा भक्ति और निष्काम कर्म की भावना को बढाती है और व्यक्ति को जीवन में सकारात्मक दिशा में ले जाती है। शिव चालीसा के पाठ से दुःख, भय, और संकट से मुक्ति मिलती है और व्यक्ति को जीवन में स्थिरता और आनंद की प्राप्ति होती है।

किसी भी सोमवार से नियमित एक माला पंचाक्षरी मंत्र- ॥ॐ नमः शिवाय॥ का जप करके ३ पाठ शिव चालीसा का पाठ करे

महत्व

शिव चालीसा भगवान शिव की स्तुति में रचित 40 पंक्तियों का भजन है। यह भजन उनके भक्तों द्वारा श्रद्धा और भक्ति के साथ गाया जाता है। शिव चालीसा का नियमित पाठ करने से अनेक लाभ प्राप्त होते हैं।

शिव चालीसा

दोहा:

॥ जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान।
कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥

चौपाई:

जय गिरिजा पति दीन दयाला।
सदा करत सन्तन प्रतिपाला॥

भाल चन्द्रमा सोहत नीके।
कानन कुण्डल नागफनी के॥

अंग गौर शिर गंग बहाये।
मुण्डमाल तन छार लगाये॥

वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे।
छवि को देख नाग मुनि मोहे॥

मैना मातु की हवे दुलारी।
बाम अंग सोहत छवि न्यारी॥

कर त्रिशूल सोहत छवि भारी।
करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥

नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे।
सागर मध्य कमल है जैसे॥

कार्तिक श्याम और गणराऊ।
या छवि को कहि जात न काऊ॥

देवन जबहि जाय पुकारा।
तबहि दुःख प्रभु आप निवारा॥

किया उपद्रव तारक भारी।
देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी॥

तुरत शडानन आप पठायउ।
लवनिमेष महँ मार गिरायउ॥

आप जलंधर असुर संहारा।
सुयश तुम्हार विदित संसारा॥

त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई।
सबहिं कृपा कर लीन बचाई॥

किया तपहिं भागीरथ भारी।
पुरब प्रतिज्ञा तासु पूरी॥

दानिन महं तुम सम कोउ नाहीं।
सेवक स्तुति करत सदाहीं॥

वेद नाम महिमा तब गाई।
अकथ अनादि भेद नहिं पाई॥

प्रगट उदधि मंथन में ज्वाला।
जरत सुरासुर भय बिसाला॥

कीन्ही दया तहां करी सहाई।
नीलकण्ठ तब नाम कहाई॥

पूजन रामचंद्र जब कीन्हा।
जितके लंक विभीषण दीन्हा॥

सहस कमल में हो रहे धारी।
कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी॥

एक कमल प्रभु राखेउ जोई।
कमल नयन पूजन चहं सोई॥

कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर।
भए प्रसन्न दिए इच्छित वर॥

जय जय जय अनंत अविनाशी।
करत कृपा सब के घटवासी॥

दुष्ट सकल नित मोहि सतावै।
भ्रमत रहे मोहि चैन न आवै॥

त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो।
यहि अवसर मोहि आन उबारो॥

लै त्रिशूल शत्रुन को मारो।
संकट से मोहि आन उबारो॥

मातु पिता भ्राता सब कोई।
संकट में पूछत नहिं कोई॥

स्वामी एक है आस तुम्हारी।
आय हरहु अब संकट भारी॥

धन निर्धन को देत सदा हीं।
जो कोई जांचे वो फल पाहीं॥

अस्तुति केहि विधि करौं तुम्हारी।
क्षमा करो हे त्रिपुरारी॥

चालीसा

शंकर हो संकट के नाशन।
मंगल कारण विघ्न विनाशन॥

योगी यति मुनि ध्यान लगावैं।
शारद नारद शीश नवावैं॥

नमो नमो जय नमः शिवाय।
सुर ब्रह्मादिक पार न पाय॥

जो यह पाठ करे मन लाई।
ता पर होई शम्भु सहाई॥

ऋनिया जो कोई हो अधिकारी।
पाठ करे सो पावन हारी॥

पुत्रहीन कर इच्छा जोई।
निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई॥

पण्डित त्रयोदशी को लावे।
ध्यान पूर्वक होम करावे॥

त्रयोदशी व्रत करे हमेशा।
तन नहीं ताके रहे कलेशा॥

धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे।
शंकर सम अभिलाष न पावे॥

लाभ

  1. संकट निवारण: जीवन के सभी संकटों का निवारण होता है।
  2. स्वास्थ्य में सुधार: शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार होता है।
  3. आध्यात्मिक उन्नति: आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।
  4. शत्रु नाशक: शत्रुओं से रक्षा होती है।
  5. धन-संपत्ति में वृद्धि: आर्थिक स्थिति में सुधार होता है।
  6. मानसिक शांति: मानसिक शांति और संतोष प्राप्त होता है।
  7. परिवार में सुख-शांति: परिवार में सुख और शांति बनी रहती है।
  8. सफलता: कार्यों में सफलता मिलती है।
  9. भय से मुक्ति: सभी प्रकार के भय से मुक्ति मिलती है।
  10. ज्ञान और विवेक: ज्ञान और विवेक की प्राप्ति होती है।
  11. संकल्प शक्ति: संकल्प शक्ति में वृद्धि होती है।
  12. सकारात्मकता: जीवन में सकारात्मकता आती है।
  13. रोगों का नाश: सभी प्रकार के रोगों का नाश होता है।
  14. प्रसन्नता: मन प्रसन्न रहता है।
  15. अखंड भक्ति: भगवान शिव की अखंड भक्ति प्राप्त होती है।
  16. प्राकृतिक आपदाओं से रक्षा: प्राकृतिक आपदाओं से रक्षा होती है।
  17. समस्याओं का समाधान: जीवन की सभी समस्याओं का समाधान होता है।
  18. कर्ज से मुक्ति: कर्ज से मुक्ति मिलती है।
  19. संतान सुख: संतान सुख की प्राप्ति होती है।
  20. दीर्घायु: दीर्घायु और स्वस्थ जीवन की प्राप्ति होती है।

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दिन, अवधि, और मुहूर्त

  • दिन: सोमवार और महाशिवरात्रि का दिन भगवान शिव की पूजा के लिए विशेष रूप से शुभ माना जाता है।
  • अवधि: शिव चालीसा का पाठ नियमित रूप से 21 दिन तक किया जा सकता है। प्रतिदिन कम से कम एक बार इसका पाठ करना चाहिए।
  • मुहूर्त: ब्रह्म मुहूर्त (सुबह 4 बजे से 6 बजे के बीच) शिव चालीसा के पाठ के लिए सर्वोत्तम समय है। इसके अतिरिक्त, प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद का समय) भी पाठ के लिए उत्तम है।

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शिव चालीसा पाठ की विधि

  1. स्नान और स्वच्छ वस्त्र: स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  2. स्थान: एक साफ और शांत स्थान पर बैठें।
  3. दीप जलाना: एक दीपक जलाकर भगवान शिव की मूर्ति या चित्र के सामने रखें।
  4. संकल्प: अपने मन में संकल्प लें और भगवान शिव का ध्यान करें।
  5. आरंभ: ‘ॐ नमः शिवाय’ और ‘श्री शिवाय नमः’ से पाठ आरंभ करें।
  6. समाप्ति: ‘जय शिव शंकर, त्रिलोचन’ से पाठ समाप्त करें।
  7. प्रसाद: पाठ के बाद भगवान शिव को नैवेद्य (प्रसाद) अर्पित करें और फिर उसे सभी में बांटें।
  8. आरती: अंत में भगवान शिव की आरती करें।

शिव चालीसा का पाठ अत्यंत सरल और प्रभावी है। इसके पाठ से भक्तों को भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है और उनके जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है। शिव चालीसा का नियमित पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं और सभी प्रकार की समस्याओं का समाधान होता है।

Saraswati chalisa gupta paath for wisdom

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ज्ञान व योग्य बढाने वाली श्री सरस्वती चालीसा का पाठ करने से विद्या, बुद्धि, कला, और ज्ञान की प्राप्ति होती है। सरस्वती चालीसा माता सरस्वती की महिमा और गुणों का वर्णन करती है और उन्हें प्रसन्न करने का प्रयास करती है। इस चालीसा के पाठ से व्यक्ति को विद्या और बुद्धि में समृद्धि मिलती है और उसका जीवन सफलता से भर जाता है। सरस्वती चालीसा के पाठ से श्रद्धा और आस्था में वृद्धि होती है और व्यक्ति के मन में संतोष और समर्पण की भावना उत्पन्न होती है। यह चालीसा विद्या और कला के क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने में सहायक होती है और व्यक्ति को समस्याओं से निपटने की क्षमता प्रदान करती है।

महत्व

सरस्वती चालीसा माँ सरस्वती की स्तुति में रचित 40 पंक्तियों का भजन है। यह भजन उनके भक्तों द्वारा श्रद्धा और भक्ति के साथ गाया जाता है। सरस्वती चालीसा का नियमित पाठ करने से अनेक लाभ प्राप्त होते हैं।

चालीसा

दोहा:

जय सरस्वती माता, मैया जय सरस्वती माता।
सदगुण वैभव शालिनी, त्रिभुवन विख्याता॥

जय सरस्वती माता, मैया जय सरस्वती माता।
सदगुण वैभव शालिनी, त्रिभुवन विख्याता॥

चौपाई:

जो तुम्हें ध्यावत, विधि हरि शंकर।
भ्रमादिक सुर सागर॥

महामाया, तुम हरख निराशा।
सकल मुनिजन पूजा॥

शारदा, माँ विधि के देने वाली।
दयामयी बुद्धि विधि देनी हारी॥

कुमति दूर करण हितारी।
सुमति बुद्धि विद्या देनी हारी॥

धरत रूप विविध असुर अरि खंडनी।
सज्जनन हित करम अरु मंडनी॥

विद्या बुद्धि विवेकान देनी।
हरहु क्लेश सब विद्या देनी॥

देहि प्रेरणा सुरकुल की नारी।
रखत मान, बढ़ावत निज नारी॥

ज्ञान ध्यान जप तप ध्यान की हो दानी।
वाणी वदन पर माता वाणी॥

बिन ज्ञान हमारो नष्ट भवानी।
बिनु ज्ञान के कैसै उधारी॥

ज्ञान बिना उर अंध सब ही।
नहि परिहै उधार हो सभी॥

शारदा माँ तुम विजयी भवानी।
मां विद्या ज्ञान की हो रानी॥

माँ शारदा हृदय धरनी हारी।
कृपा करहु बिनती हमारी॥

निज जन हित विधि सुखकारी।
विद्या दे निज जन भुवन सारी॥

जय सरस्वती माता, मैया जय सरस्वती माता।
सदगुण वैभव शालिनी, त्रिभुवन विख्याता॥

लाभ

  1. ज्ञान की प्राप्ति: मां सरस्वती की कृपा से ज्ञान की प्राप्ति होती है।
  2. बुद्धि की वृद्धि: बुद्धि और विवेक में वृद्धि होती है।
  3. विद्या में उन्नति: शिक्षा में उन्नति होती है।
  4. स्मरण शक्ति: स्मरण शक्ति में वृद्धि होती है।
  5. कला और संगीत: कला और संगीत में कुशलता प्राप्त होती है।
  6. साहित्य में रुचि: साहित्य और लेखन में रुचि बढ़ती है।
  7. मानसिक शांति: मानसिक शांति और संतोष प्राप्त होता है।
  8. एकाग्रता: एकाग्रता और ध्यान की क्षमता बढ़ती है।
  9. सकारात्मकता: जीवन में सकारात्मकता आती है।
  10. वाणी की मधुरता: वाणी में मधुरता और प्रभावशालीता आती है।
  11. संकल्प शक्ति: संकल्प शक्ति में वृद्धि होती है।
  12. आत्मविश्वास: आत्मविश्वास में वृद्धि होती है।
  13. सफलता: परीक्षाओं और प्रतियोगिताओं में सफलता प्राप्त होती है।
  14. आध्यात्मिक उन्नति: आध्यात्मिक विकास होता है।
  15. शांति और समृद्धि: परिवार में शांति और समृद्धि आती है।
  16. रचनात्मकता: रचनात्मकता और नवीन विचारों की प्राप्ति होती है।
  17. समस्याओं का समाधान: जीवन की सभी समस्याओं का समाधान होता है।
  18. भय मुक्ति: सभी प्रकार के भय से मुक्ति मिलती है।
  19. अखंड भक्ति: मां सरस्वती की अखंड भक्ति प्राप्त होती है।
  20. शारीरिक स्वास्थ्य: शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार होता है।

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दिन, अवधि, और मुहूर्त

  • दिन: वसंत पंचमी और गुरुवार का दिन मां सरस्वती की पूजा के लिए विशेष रूप से शुभ माना जाता है।
  • अवधि: सरस्वती चालीसा का पाठ नियमित रूप से 21 दिन तक किया जा सकता है। प्रतिदिन कम से कम एक बार इसका पाठ करना चाहिए।
  • मुहूर्त: ब्रह्म मुहूर्त (सुबह 4 बजे से 6 बजे के बीच) सरस्वती चालीसा के पाठ के लिए सर्वोत्तम समय है। इसके अतिरिक्त, सुबह और शाम के समय भी पाठ किया जा सकता है।

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सरस्वती चालीसा पाठ की विधि

  1. स्नान और स्वच्छ वस्त्र: स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  2. स्थान: एक साफ और शांत स्थान पर बैठें।
  3. दीप जलाना: एक दीपक जलाकर मां सरस्वती की मूर्ति या चित्र के सामने रखें।
  4. संकल्प: अपने मन में संकल्प लें और मां सरस्वती का ध्यान करें।
  5. आरंभ: ‘श्री गणेशाय नमः’ और ‘श्री सरस्वती माता की जय’ से पाठ आरंभ करें।
  6. समाप्ति: ‘जय सरस्वती माता, मैया जय सरस्वती माता’ से पाठ समाप्त करें।
  7. प्रसाद: पाठ के बाद मां सरस्वती को नैवेद्य (प्रसाद) अर्पित करें और फिर उसे सभी में बांटें।
  8. आरती: अंत में मां सरस्वती की आरती करें।

सरस्वती चालीसा का पाठ अत्यंत सरल और प्रभावी है। इसके पाठ से भक्तों को मां सरस्वती की कृपा प्राप्त होती है और उनके जीवन में ज्ञान, बुद्धि, शांति और समृद्धि आती है। सरस्वती चालीसा का नियमित पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं और सभी प्रकार की समस्याओं का समाधान होता है।

Lakshmi chalisa paath for wealth & prosperity

Lakshmi chalisa paath for wealth & prosperity

आर्थिक उन्नति प्रदान करने वाली श्री लक्ष्मी चालीसा का पाठ करने से धन, समृद्धि, सौभाग्य, सुख, शांति, और सम्पत्ति की प्राप्ति होती है। लक्ष्मी चालीसा माता लक्ष्मी की महिमा और गुणों का वर्णन करती है और उन्हें प्रसन्न करने का प्रयास करती है। इस चालीसा के पाठ से व्यक्ति को धन प्राप्ति में सहायता मिलती है और उसका जीवन समृद्धि से भर जाता है। लक्ष्मी चालीसा के पाठ से धन की वृद्धि होती है और व्यक्ति की आर्थिक स्थिति मजबूत होती है। यह चालीसा लक्ष्मी माता की कृपा को प्राप्त करने का अचूक तरीका है और उन्हें अपने भक्तों की सभी इच्छाओं को पूरा करने की शक्ति प्रदान करती है।

महत्व

लक्ष्मी चालीसा भगवान विष्णु की पत्नी, माता लक्ष्मी की स्तुति में रचित 40 पंक्तियों का भजन है। यह भजन उनके भक्तों द्वारा श्रद्धा और भक्ति के साथ गाया जाता है। लक्ष्मी चालीसा का नियमित पाठ करने से अनेक लाभ प्राप्त होते हैं।

लक्ष्मी चालीसा

दोहा:

॥ माता लक्ष्मी कर कृपा, करो हृदय में वास।
करहु कृपा हे ममतामयी, हरहु विपत्ति कलेश ॥

चौपाई:

जै जै हे लक्ष्मी माई,
तुमहीं हो धन की देनहार।
विष्णु प्रिया जगजननी,
जगत में सबके आधार॥

चौदह रत्नों में तुम श्रेष्ठ,
देव दनुज सब करें पुकार।
तुम बिन कोई नहीं है सबला,
सृष्टि का तुमने किया संभार॥

रूप चतुर्भुज धारण करती,
कमलासन पर आसीन।
हाथों में वरद मुद्रा है,
जगत पालन करती हो दीन॥

हर प्राणी की तुम सहायक,
भक्तों को दे वरदान।
करो कृपा मुझ पर माता,
पूर्ण करो मेरे अरमान॥

जब भी जग में संकट आता,
तुम्हीं संकट मोचन होती।
तुम्हारे स्मरण से माता,
सुख संपत्ति के द्वार खुलते॥

सदा सहाय रहो हे माता,
विष्णु के संग निवास।
करो कृपा हे ममतामयी,
हरो विपत्ति और त्रास॥

लाभ

  1. आर्थिक समृद्धि: माता लक्ष्मी की कृपा से धन-संपत्ति में वृद्धि होती है।
  2. सुख-समृद्धि: जीवन में सुख और समृद्धि आती है।
  3. संकट निवारण: सभी प्रकार के संकटों का निवारण होता है।
  4. भय मुक्ति: सभी प्रकार के भय से मुक्ति मिलती है।
  5. स्वास्थ्य लाभ: स्वास्थ्य में सुधार होता है।
  6. मानसिक शांति: मानसिक शांति और संतोष प्राप्त होता है।
  7. समस्याओं का समाधान: जीवन की सभी समस्याओं का समाधान होता है।
  8. कर्ज मुक्ति: कर्ज से मुक्ति मिलती है।
  9. व्यापार में उन्नति: व्यापार में वृद्धि होती है।
  10. नौकरी में प्रमोशन: नौकरी में उन्नति मिलती है।
  11. शत्रु नाशक: शत्रुओं से रक्षा होती है।
  12. धार्मिक उन्नति: आध्यात्मिक उन्नति होती है।
  13. ग्रह दोष निवारण: सभी प्रकार के ग्रह दोष दूर होते हैं।
  14. संकल्प शक्ति: संकल्प शक्ति में वृद्धि होती है।
  15. प्रसन्नता: मन प्रसन्न रहता है।
  16. पारिवारिक सुख: परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।
  17. सौभाग्य: जीवन में सौभाग्य आता है।
  18. दिव्य दृष्टि: आत्मज्ञान और दिव्य दृष्टि की प्राप्ति होती है।
  19. मान-सम्मान: समाज में मान-सम्मान बढ़ता है।
  20. अखंड भक्ति: माता लक्ष्मी की अखंड भक्ति प्राप्त होती है।

दिन, अवधि, और मुहूर्त

  • दिन: शुक्रवार का दिन माता लक्ष्मी की पूजा के लिए विशेष रूप से शुभ माना जाता है।
  • अवधि: लक्ष्मी चालीसा का पाठ नियमित रूप से 21 दिन तक किया जा सकता है। प्रतिदिन कम से कम एक बार इसका पाठ करना चाहिए।
  • मुहूर्त: सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल (शाम के समय) लक्ष्मी चालीसा के पाठ के लिए सर्वोत्तम समय है। इसके अतिरिक्त, धनतेरस, दीपावली, और पूर्णिमा के दिन भी लक्ष्मी चालीसा का पाठ अत्यंत लाभकारी होता है।

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लक्ष्मी चालीसा पाठ की विधि

  1. स्नान और स्वच्छ वस्त्र: स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  2. स्थान: एक साफ और शांत स्थान पर बैठें।
  3. दीप जलाना: एक दीपक जलाकर माता लक्ष्मी की मूर्ति या चित्र के सामने रखें।
  4. संकल्प: अपने मन में संकल्प लें और माता लक्ष्मी का ध्यान करें।
  5. आरंभ: ‘श्री गणेशाय नमः’ और ‘श्री लक्ष्मी माता की जय’ से पाठ आरंभ करें।
  6. समाप्ति: ‘माता लक्ष्मी कर कृपा, करो हृदय में वास’ से पाठ समाप्त करें।
  7. प्रसाद: पाठ के बाद माता लक्ष्मी को नैवेद्य (प्रसाद) अर्पित करें और फिर उसे सभी में बांटें।
  8. आरती: अंत में माता लक्ष्मी की आरती करें।

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लक्ष्मी चालीसा का पाठ अत्यंत सरल और प्रभावी है। इसके पाठ से भक्तों को माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है और उनके जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है। लक्ष्मी चालीसा का नियमित पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं और सभी प्रकार की समस्याओं का समाधान होता है।

Ganesha chalisa paath for success

Ganesha chalisa paath for success

हर तरह का विघ्न समाप्त करने वाले श्री गणेश चालीसा पाठ करने से गणेश भगवान की कृपा प्राप्त होती है और उनका आशीर्वाद मिलता है। यह चालीसा गणेश जी की महिमा और गुणों का वर्णन करती है और उन्हें प्रसन्न करने का प्रयास करती है।

इस चालीसा को नित्य पढ़ने से मनुष्य को जीवन में सफलता, सुख, शांति, समृद्धि, आरोग्य और धन की प्राप्ति होती है। गणेश चालीसा के पाठ से मनोबल बढ़ता है और आत्मविश्वास में सुधार होता है। यह चालीसा भक्ति और निष्काम कर्म की भावना को उत्तेजित करती है और व्यक्ति को जीवन में सकारात्मक दिशा में ले जाती है।

इसके अलावा, गणेश चालीसा के पाठ से भक्ति और श्रद्धा में वृद्धि होती है और मानसिक चिंताओं से मुक्ति मिलती है। इस चालीसा का पाठ करने से गणेश भगवान हर प्रकार की कष्ट, संकट और दुर्भाग्य से रक्षा करते हैं और उन्हें जीवन में सफलता प्रदान करते हैं।

महत्व

गणेश चालीसा भगवान गणेश की स्तुति में रचित 40 पंक्तियों का एक सुंदर भजन है। यह भक्तों द्वारा बड़े श्रद्धा और भक्ति से गाया जाता है। गणेश चालीसा का नियमित पाठ करने से जीवन में अनेक लाभ प्राप्त होते हैं।

लाभ

  1. विघ्न नाशक: सभी प्रकार की विघ्न बाधाओं को दूर करता है।
  2. सफलता: कार्यों में सफलता प्राप्त होती है।
  3. बुद्धि और ज्ञान: बुद्धि और ज्ञान में वृद्धि होती है।
  4. धन संपत्ति: आर्थिक स्थिति में सुधार होता है।
  5. स्वास्थ्य: स्वास्थ्य में सुधार होता है और बीमारियों से मुक्ति मिलती है।
  6. शांति: मानसिक शांति और संतोष प्राप्त होता है।
  7. सुख समृद्धि: परिवार में सुख और समृद्धि बढ़ती है।
  8. मनोकामना पूर्ण: सभी मनोकामनाएँ पूरी होती हैं।
  9. शत्रु नाशक: शत्रुओं से रक्षा होती है।
  10. समस्याओं का समाधान: जीवन की सभी समस्याओं का समाधान होता है।
  11. शुभता: जीवन में शुभता और सकारात्मकता आती है।
  12. आध्यात्मिक उन्नति: आध्यात्मिक विकास और जागरूकता बढ़ती है।
  13. कर्ज मुक्ति: कर्ज से मुक्ति मिलती है।
  14. संकल्प शक्ति: संकल्प शक्ति में वृद्धि होती है।
  15. समृद्धि: जीवन में समृद्धि और संपन्नता आती है।
  16. प्रसन्नता: मन प्रसन्न रहता है और उदासी दूर होती है।
  17. वाणी की मधुरता: वाणी में मधुरता आती है।
  18. संकटों से रक्षा: सभी प्रकार के संकटों से रक्षा होती है।
  19. दिव्य दृष्टि: आत्मज्ञान और दिव्य दृष्टि की प्राप्ति होती है।
  20. अखंड भक्ति: भगवान गणेश की अखंड भक्ति प्राप्त होती है।

दिन, अवधि, और मुहूर्त

  • दिन: बुधवार और चतुर्थी तिथि विशेष रूप से गणेश जी की पूजा के लिए माने जाते हैं। इन दिनों में गणेश चालीसा का पाठ अत्यंत लाभकारी होता है।
  • अवधि: गणेश चालीसा का पाठ नियमित रूप से 40 दिन तक किया जा सकता है। प्रतिदिन कम से कम एक बार इसका पाठ करना चाहिए।
  • मुहूर्त: सूर्योदय से पहले ब्रह्म मुहूर्त (सुबह 4 बजे से 6 बजे के बीच) गणेश चालीसा के पाठ के लिए सर्वोत्तम समय है। शाम के समय सूर्यास्त के बाद भी इसका पाठ किया जा सकता है।

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गणेश चालीसा पाठ की विधि

  1. स्नान और स्वच्छ वस्त्र: सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  2. स्थान: एक साफ और शांत स्थान पर बैठें।
  3. दीप जलाना: एक दीपक जलाकर भगवान गणेश की मूर्ति या चित्र के सामने रखें।
  4. संकल्प: अपने मन में संकल्प लें और भगवान गणेश का ध्यान करें।
  5. आरंभ: ‘श्री गणेशाय नमः’ से गणेश चालीसा का पाठ आरंभ करें।
  6. समाप्ति: ‘जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा, माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा।’ के साथ पाठ समाप्त करें।
  7. प्रसाद: पाठ के बाद गणेश जी को नैवेद्य (प्रसाद) अर्पित करें और फिर उसे सभी में बांटें।
  8. आरती: अंत में गणेश जी की आरती करें।

गणेश चालीसा का पाठ अत्यंत सरल और प्रभावी है। इसके पाठ से भक्तों को भगवान गणेश की कृपा प्राप्त होती है और उनके जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है। गणेश चालीसा का नियमित पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं और सभी प्रकार की समस्याओं का समाधान होता है।

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श्री गणेश चालीसा

दोहा:

॥ जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान ॥ ॥ कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान ॥

चौपाई:

जय गणेश गिरिजा सुवन।
मंगल मूलकृपा निकेतन॥

अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता।
अस बर दीन जानकी माता॥

हाथ सुदर्शन चक्र विराजे।
कानन कुण्डल नाग फनी के॥

अंग गौर शिर गंग विराजे।
त्रिपुण्ड चन्दन तिलक लगावै॥

वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे।
छवि को देख नाग मुनि मोहै॥

मैना मातु की हवे दुलारी।
बाम अंग सोहत छवि न्यारी॥

कर त्रिशूल सोहत छवि भारी।
करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥

नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे।
सागर मध्य कमल है जैसे॥

कार्तिक श्याम और गणराऊ।
या छवि को कहि जात न काऊ॥

देवन जबहि जाय पुकारा।
तबहि दुःख प्रभु आप निवारा॥

किया उपद्रव तारक भारी।
देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी॥

तुरत षडानन आप पठायउ।
लवनिमेष महँ मारि गिरायउ॥

आप जलंधर असुर संहारा।
सुयश तुम्हार विदित संसारा॥

त्रिपुरारि संहारि बनायउ।
भूत बेताल साथ लिवायउ॥

अमित विक्रम कोई नहिं तौलो।
गहिर शत्रु रन लंक सकोलो॥

प्रभु कृपा करि सम्भु अज ध्यावा।
कुमकुम चंदन पाट चढ़ावा॥

कंचन भवन सोभित दृढ़ काहा।
अन्य सभी मुख देखी तुमहिं॥

मांगा मुख क्षण महँ सीव धारी।
दिया नवोज सिद्धि सुर धारी॥

जय जय जय गणपति देवा।
मातु सुत सुर तुल्य हिया॥

सूर्य धूप दीयो हितु गोसाँ।
तासु सूक्ष्म बनाओ हितु तासाँ॥

बन्धु जानिक सुमिरो ताहि।
जीवन मृत्यु वश ताहि॥

Hanuman chalisa paath for Wish & Protection

Hanuman chalisa gupta paath for Wish & Protection

इस हनुमान चालीसा का पाठ करने के पहले एक माला हनुमान मंत्र ॥ॐ हं हनुमंते हं नमः॥ का जप करे. इसके बाद ३ पाठ हनुमान चालीसा पाठ किसी भी मंगलवार से नियमित करे। हनुमान चालीसा गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित एक अति महत्वपूर्ण भजन है, जो भगवान हनुमान की स्तुति में लिखा गया है। इसमें 40 चौपाइयाँ हैं और यह भक्तों द्वारा अत्यधिक श्रद्धा से गाया जाता है। हनुमान चालीसा का पाठ करने से अनेक लाभ प्राप्त होते हैं।

लाभ

  1. भय मुक्ति: हनुमान चालीसा का पाठ करने से सभी प्रकार के भय दूर हो जाते हैं।
  2. स्वास्थ्य लाभ: हनुमान जी की कृपा से व्यक्ति का स्वास्थ्य अच्छा रहता है।
  3. मानसिक शांति: मानसिक तनाव और चिंता से मुक्ति मिलती है।
  4. धन लाभ: आर्थिक स्थिति में सुधार होता है।
  5. शत्रु बाधा से मुक्ति: शत्रुओं से रक्षा होती है और वे परास्त होते हैं।
  6. विघ्न बाधा से मुक्ति: सभी प्रकार की विघ्न बाधाएं दूर होती हैं।
  7. शुभता की प्राप्ति: जीवन में शुभता और सकारात्मकता आती है।
  8. आध्यात्मिक उन्नति: आध्यात्मिक विकास और जागरूकता बढ़ती है।
  9. कर्ज मुक्ति: कर्ज से मुक्ति मिलती है।
  10. ग्रह दोष निवारण: सभी प्रकार के ग्रह दोष दूर होते हैं।
  11. कार्य सिद्धि: सभी कार्य सफल होते हैं।
  12. संकल्प शक्ति: संकल्प शक्ति में वृद्धि होती है।
  13. मान-सम्मान की प्राप्ति: समाज में मान-सम्मान बढ़ता है।
  14. पारिवारिक सुख: परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।
  15. वाणी की मधुरता: वाणी में मधुरता आती है।
  16. संकटों से रक्षा: सभी प्रकार के संकटों से रक्षा होती है।
  17. अखंड भक्ति: भगवान हनुमान की अखंड भक्ति प्राप्त होती है।
  18. सौभाग्य की प्राप्ति: जीवन में सौभाग्य आता है।
  19. जीवन में संतोष: जीवन में संतोष और संतुलन आता है।
  20. दिव्य दृष्टि: आत्मज्ञान और दिव्य दृष्टि की प्राप्ति होती है।

दिन, अवधि, और मुहूर्त

  • दिन: मंगलवार और शनिवार हनुमान जी की पूजा के लिए विशेष दिन माने जाते हैं। इन दिनों में हनुमान चालीसा का पाठ अत्यंत लाभकारी होता है।
  • अवधि: हनुमान चालीसा का पाठ नियमित रूप से 40 दिन तक किया जा सकता है। प्रतिदिन कम से कम एक बार इसका पाठ करना चाहिए।
  • मुहूर्त: सूर्योदय से पहले ब्रह्म मुहूर्त (सुबह 4 बजे से 6 बजे के बीच) हनुमान चालीसा के पाठ के लिए सर्वोत्तम समय है। शाम के समय सूर्यास्त के बाद भी इसका पाठ किया जा सकता है।

विधि

  1. स्नान और स्वच्छ वस्त्र: सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  2. स्थान: एक साफ और शांत स्थान पर बैठें।
  3. दीप जलाना: एक दीपक जलाकर भगवान हनुमान की मूर्ति या चित्र के सामने रखें।
  4. संकल्प: अपने मन में संकल्प लें और भगवान हनुमान का ध्यान करें।
  5. आरंभ: ‘श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मनु मुकुर सुधारि’ से हनुमान चालीसा का पाठ आरंभ करें।
  6. समाप्ति: ‘पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप। राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥’ के साथ पाठ समाप्त करें।
  7. प्रसाद: पाठ के बाद हनुमान जी को नैवेद्य (प्रसाद) अर्पित करें और फिर उसे सभी में बांटें।
  8. आरती: अंत में हनुमान जी की आरती करें।

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हनुमान चालीसा

जय हनुमान ज्ञान गुण सागर। जय कपीश तिहुँ लोक उजागर॥
रामदूत अतुलित बलधामा। अंजनि पुत्र पवनसुत नामा॥
महाबीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी॥
कंचन वरण विराज सुबेसा। कानन कुंडल कुंचित केसा॥
हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै। काँधे मूँज जनेऊ साजै॥
शंकर सुवन केसरी नंदन। तेज प्रताप महाजग वंदन॥
विद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर॥
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया॥
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। विकट रूप धरि लंक जरावा॥
भीम रूप धरि असुर संहारे। रामचंद्र के काज सवारे॥
लाय सजीवन लखन जियाए। श्रीरघुवीर हरषि उर लाए॥
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥
सहस बदन तुम्हरो यश गावैं। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा॥
जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते। कवि कोविद कहि सके कहाँ ते॥
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीहिं। राम मिलाय राज पद दीहिं॥
तुम्हरो मंत्र विभीषण माना। लंकेश्वर भए सब जग जाना॥
युग सहस्र योजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं। जलधि लांघि गये अचरज नाहीं॥
दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥
राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥
सब सुख लहै तुम्हारी शरणा। तुम रक्षक काहू को डर ना॥

हनुमान चालीसा

आपन तेज सम्हारो आपै। तीनों लोक हांक तें कांपै॥
भूत पिशाच निकट नहिं आवै। महाबीर जब नाम सुनावै॥
नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा॥
संकट तें हनुमान छुड़ावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥
सब पर राम तपस्वी राजा। तिनके काज सकल तुम साजा॥
और मनोरथ जो कोई लावै। सोई अमित जीवन फल पावै॥
चारों युग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा॥
साधु संत के तुम रखवारे। असुर निकंदन राम दुलारे॥
अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता। अस बर दीन्ह जानकी माता॥
राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा॥
तुम्हरे भजन रामको पावै। जनम जनम के दुख बिसरावै॥
अंत काल रघुबर पुर जाई। जहां जन्म हरिभक्त कहाई॥
और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेई सर्व सुख करई॥
संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलवीरा॥
जय जय जय हनुमान गोसाईं। कृपा करहु गुरुदेव की नाईं॥
जो शत बार पाठ कर कोई। छूटहि बंदि महा सुख होई॥
जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा। होय सिद्धि साखी गौरीसा॥
तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय महं डेरा॥

दोहा।

पवन तनय संकट हरण मंगल मूरति रूप। राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर भूप॥

हनुमान चालीसा का पाठ अत्यंत सरल है और इसके लाभ अनगिनत हैं। यह न केवल भक्तों को आध्यात्मिक बल प्रदान करता है, बल्कि उन्हें जीवन के हर क्षेत्र में सफलता और समृद्धि दिलाने में भी मदद करता है। हनुमान चालीसा का नियमित पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं और उसे भगवान हनुमान की कृपा प्राप्त होती है।

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Maruti Hanuman mantra for Lineage growth

मारुतिनंदन / Maruti Hanuman mantra for Lineage growth

संतान का आशिर्वाद देने वाले हनुमान जी को “मारुति” या “मारुतिनंदन” के नाम से भी जाना जाता है। “मारुत” शब्द का अर्थ “हवा” और “नंदन” का अर्थ “पुत्र” होता है। इसलिए, “मारुतिनंदन” का मतलब है “हवा का पुत्र।” भगवान शिव के 11वें रुद्रावतार माने जाते हैं और असीम शक्ति, भक्ति, और ज्ञान के प्रतीक हैं। हनुमानजी का स्वरूप बहुत ही प्रेरणादायक माना जाता है।

मारुतिनंदन का स्वरूप

हनुमानजी का स्वरूप बहुत ही अद्भुत और प्रभावशाली है। उनका शरीर बलवान, विशाल, और कठोर है। वे वानर के रूप में होते हैं और उनकी पूंछ लम्बी और मजबूत होती है। उनकी आँखें तेज और कानों पर विशेष तरह के आभूषण होते हैं। हनुमानजी का मुख कपि (वानर) के समान होता है, और उनका शरीर सुनहरे रंग का होता है। वे अपने हाथ में गदा धारण करते हैं और कभी-कभी वे पर्वत को उठाए हुए भी दिखाए जाते हैं।

मारुतिनंदन मंत्र का अर्थ

मंत्र:

मंत्र का अर्थ:

  • ” परमात्मा का प्रतीक है।
  • हं” हनुमानजी का बीज मंत्र है।
  • मारुति नंदनाय” का अर्थ है मारुत (वायु) के पुत्र को।
  • नमो नमः” का अर्थ है नमन करना या प्रणाम करना।

इस मंत्र का उच्चारण करने से सभी प्रकार की बाधाओं और संकटों से मुक्ति मिलती है।

लाभ

  1. कार्य क्षमता: कार्यक्षमता में वृद्धि होती है।
  2. विवाद मुक्ति: जीवन में आने वाले विवादों से मुक्ति मिलती है।
  3. शत्रु से सुरक्षा: शत्रुओं से सुरक्षा प्राप्त होती है।
  4. ब्यापार तरक्की: व्यापार में उन्नति और सफलता मिलती है।
  5. आर्थिक बाधा: आर्थिक समस्याओं का समाधान होता है।
  6. नौकरी में उन्नति: नौकरी में पदोन्नति और उन्नति मिलती है।
  7. असुरक्षा की भावना: असुरक्षा की भावना से मुक्ति मिलती है।
  8. भय से मुक्ति: भय और डर से छुटकारा मिलता है।
  9. कार्य सिद्धि: सभी कार्यों में सफलता मिलती है।
  10. तंत्र बाधा: तंत्र-मंत्र की बाधाओं से मुक्ति मिलती है।
  11. आर्थिक बंधन: आर्थिक बंधनों से छुटकारा मिलता है।
  12. क्लेश मुक्ति: जीवन में क्लेश और अशांति से मुक्ति मिलती है।
  13. मानसिक शक्ति: मानसिक शक्ति और धैर्य में वृद्धि होती है।
  14. अध्यात्मिक शक्ति: अध्यात्मिक शक्ति और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है।
  15. ग्रहस्थ सुख: ग्रहस्थ जीवन में सुख-शांति और समृद्धि आती है।
  16. परिवार में सुख-शांति: परिवार में सुख-शांति और सद्भावना आती है।
  17. विघ्न बाधा: सभी प्रकार की विघ्न बाधाओं का निवारण होता है।
  18. आर्थिक सुरक्षा: आर्थिक सुरक्षा और स्थिरता प्राप्त होती है।
  19. स्वास्थ्य लाभ: स्वास्थ्य में सुधार और रोगों से मुक्ति मिलती है।
  20. योग्यता में वृद्धि: योग्यता और क्षमता में वृद्धि होती है।

सामग्री

  1. पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, और शक्कर)
  2. गंगाजल
  3. काले तिल
  4. कुशा (एक प्रकार की पवित्र घास)
  5. तुलसी पत्र
  6. केले के पत्ते
  7. फूल
  8. धूप और दीपक
  9. चंदन
  10. अक्षत (चावल)
  11. शुद्ध घी
  12. कपूर
  13. हवन सामग्री
  14. पवित्र धागा (कच्चा सूत)
  15. नारियल
  16. फल
  17. वस्त्र (धोती और अंगवस्त्रम)
  18. ब्राह्मण भोज के लिए अन्न और अन्य सामग्री

पूजा का समय

  • महुर्त: सुबह के समय ब्रह्म मुहूर्त में पूजा करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
  • दिन: मंगलवार और शनिवार हनुमानजी की पूजा के लिए विशेष रूप से उपयुक्त होते हैं।
  • अवधि: पूजा की अवधि कम से कम 1 घंटे की होनी चाहिए।

पूजा की विधि

  1. स्नान और शुद्धि: स्नान करके शुद्ध वस्त्र धारण करें।
  2. स्थान चयन: पूजा के लिए शुद्ध और शांत स्थान का चयन करें।
  3. मंडल तैयार करना: भूमि को पवित्र करके मंडल बनाएं।
  4. देवताओं का आह्वान: पंचदेवों (गणेश, विष्णु, शिव, शक्ति और सूर्य) का आह्वान करें।
  5. संकल्प: अपने दोषों के निवारण के लिए संकल्प लें।
  6. हनुमानजी की स्थापना: हनुमानजी की प्रतिमा या चित्र की स्थापना करें।
  7. अभिषेक: पंचामृत और गंगाजल से अभिषेक करें।
  8. मंत्र जाप: मारुतिनंदन मंत्र का जाप करें।
  9. हवन: हवन सामग्री और घी से हवन करें।
  10. ब्राह्मण भोज: ब्राह्मणों को भोजन कराएं और वस्त्र दान करें।
  11. प्रसाद वितरण: पूजा के अंत में प्रसाद वितरण करें।

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सावधानियाँ

  1. शुद्धता का ध्यान रखें: पूजा के दौरान शुद्धता का विशेष ध्यान रखें।
  2. सही विधि का पालन करें: पूजा विधि का सही ढंग से पालन करें।
  3. अनुभवी पंडित का सहयोग लें: पूजा के लिए अनुभवी पंडित की सहायता लें।
  4. ब्राह्मण भोज और दान: ब्राह्मण भोज और दान को विशेष रूप से महत्व दें।
  5. संकल्प में दृढ़ता रखें: संकल्प में दृढ़ता और श्रद्धा रखें।

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मारुतिनंदन मंत्र – FAQs

  1. मारुतिनंदन कौन हैं?
    • मारुतिनंदन हनुमानजी का ही एक नाम है, जो वायु देवता के पुत्र के रूप में प्रसिद्ध हैं।
  2. मारुतिनंदन मंत्र का क्या अर्थ है?
    • मारुतिनंदन मंत्र का अर्थ है हनुमानजी को नमन करना और उनकी शक्ति और कृपा की प्राप्ति करना।
  3. मारुतिनंदन की पूजा के क्या लाभ हैं?
    • कार्य क्षमता, विवाद मुक्ति, शत्रु से सुरक्षा, व्यापार तरक्की, आर्थिक बाधाओं से मुक्ति, नौकरी में उन्नति, और मानसिक शक्ति की प्राप्ति।
  4. मारुतिनंदन की पूजा किस दिन करनी चाहिए?
    • मंगलवार और शनिवार को विशेष रूप से हनुमानजी की पूजा करनी चाहिए।
  5. मारुतिनंदन की पूजा का समय क्या होना चाहिए?
    • सुबह के समय ब्रह्म मुहूर्त में पूजा करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
  6. पूजा की सामग्री क्या है?
    • पंचामृत, गंगाजल, काले तिल, कुशा, तुलसी पत्र, केले के पत्ते, फूल, धूप, दीपक, चंदन, अक्षत, शुद्ध घी, कपूर, हवन सामग्री, पवित्र धागा, नारियल, फल, और वस्त्र।
  7. क्या पूजा के दौरान व्रत रखना चाहिए?
    • हाँ, पूजा के दौरान व्रत रखना लाभकारी होता है।
  8. क्या पूजा के बाद विशेष दान करना चाहिए?
    • हाँ, पूजा के बाद दान करना शुभ माना जाता है।
  9. क्या पूजा घर में कर सकते हैं?
    • हाँ, इस पूजा को घर में भी किया जा सकता है, लेकिन स्थान शुद्ध और शांत होना चाहिए।
  10. ब्राह्मण भोज का महत्व क्या है?
    • ब्राह्मण भोज से पित्रों की आत्मा को शांति मिलती है और श्रापित दोष का निवारण होता है।
  11. क्या पूजा के दौरान विशेष वस्त्र धारण करने चाहिए?
    • हाँ, पूजा के दौरान शुद्ध और स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए।
  12. क्या पूजा के बाद विशेष अनुष्ठान करने चाहिए?
    • हाँ, पूजा के बाद प्रसाद वितरण और ब्राह्मण भोज करना चाहिए।