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Durga gupta chalisa paath

नियमित दुर्गा चालीसा का पाठ करने से माता दुर्गा की कृपा मिलती है. माता का पाठ करने के पहले एक माला दुर्गा मंत्र “॥ॐ गुं दुर्गे नमः॥” का जप करना चाहिये.

दुर्गा चालीसा का पाठ करने से माता दुर्गा की कृपा प्राप्त होती है और भक्त की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। यह चालीसा माता दुर्गा की प्रसन्नता और आशीर्वाद को प्राप्त करने में सहायक होती है। चालीसा का पाठ करने से भय, भ्रम और अज्ञानता का नाश होता है और व्यक्ति का मनोबल बढ़ता है।

यह पाठ मानसिक शांति, स्थिरता और सुख-समृद्धि की प्राप्ति में मदद करता है। दुर्गा चालीसा का पाठ करने से सभी प्रकार की संकट और कष्टों से मुक्ति मिलती है। इस चालीसा का पाठ करने से समस्त बुराइयों से मुक्ति मिलती है और जीवन में सफलता प्राप्त होती है। दुर्गा चालीसा का पाठ नियमित रूप से करने से व्यक्ति का मान-सम्मान बढ़ता है और उसका जीवन समृद्धि से भर जाता है।

  1. शुक्रवार को पढ़ने के लाभ: दुर्गा चालीसा को शुक्रवार को पढ़ने से विशेष लाभ होता है। यह माता दुर्गा के प्रति भक्ति और विश्वास को बढ़ाता है।
  2. मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं: दुर्गा चालीसा का पाठ करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और भक्त को माता दुर्गा की कृपा प्राप्त होती है।
  3. शांति और समृद्धि की प्राप्ति: चालीसा का पाठ करने से शांति, समृद्धि, और सम्पत्ति की प्राप्ति होती है।
  4. संकट से मुक्ति: माता दुर्गा की चालीसा का पाठ करने से सभी प्रकार के संकट और कष्टों से मुक्ति मिलती है।
  5. जीवन की समस्याओं का समाधान: यह चालीसा व्यक्ति को जीवन की सभी समस्याओं का समाधान देती है और उसे सही राह दिखाती है।

दुर्गा चालीसा ॥ नमो नमो दुर्गे सुख करनी ॥ नमो नमो अम्बे दुःख हरनी ॥ निरंकार है ज्योति तुम्हारी ॥ तिहूँ लोक फैली उजियारी ॥ शशि ललाट मुख महाविशाला ॥ नेत्र लाल भृकुटी विकराला ॥ रूप मातु को अधिक सुहावनी ॥ शुभ लव खंडना जग में जानी ॥ रत्न कर मकर कोटि रूपा ॥ त्रिपुरारि जग पालन हारा ॥ त्रिगुण स्वामिनि त्रिबिध निधानी ॥ भूत पिशाच निकट नहिं आनी ॥ महिषासुर नर वैरी युद्ध आवहु ॥ लीजै शरण निज जानि भवानी ॥ करि विनती सदा भूलि पालकी ॥ मातु ब्रह्मा दास तुम्हारी ॥ रत्न सिंहासन बैठी छवि मातु ॥ अम्बिका माई जगदम्बा तारिणी ॥ योगीअन सुरमुनि पूजित नर नारी ॥ तुम गुण के धाम त्रिभुवन सुखदाम ॥ आनन्द करें ज्यों नारि गावत ॥ नृत्य करत भृंगी अरु ताली ॥ तुम संकट मोक्षनीक अवतारी ॥ लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं ॥ श्री अम्बे जी की आरती जो कोई नर गावे ॥ कहत शिवानन्द स्वामी सुख सम्पति पावे ॥

जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी । तुमको निशदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी ॥ जय अम्बे गौरी…

माँग सिंदूर विराजत, टिको मृगमद को । उज्जवल सेव्यों तिनको, तिनको तेज प्रतिको ॥ जय अम्बे गौरी…

कानन कुंडल शोभित, नासाग्रे मोती । कोटिक चन्द्र दिवाकर, राजत सम जोती ॥ जय अम्बे गौरी…

शुमन शुभ्र बलकरी, कन्दन कुँकुमारी । बालक का मुकुट विराजत, टिको लिये फारी ॥ जय अम्बे गौरी…

अन्धकार जले सिंधु में, ज्योति कलश जावें । भानु मंडल मध्यज्वाला, चंद्रमा ज्योति जावें ॥ जय अम्बे गौरी…

शुभ्र ब्रह्मरूपधरी, महाकाली महिषासुरमर्दिनी । सुरवर वरदे, जय जय हे महिषासुरमर्दिनी ॥ जय अम्बे गौरी…

एक भुजा चारु चक्रुधारी, मटकर मुक्तावली । धर विराजतों, मृगमद को, ध्यान विगत टीकावली ॥ जय अम्बे गौरी…

महिषासुर संहारिणी, कराल वधातिकारी । विजय विश्व तारिणी, कल्याणकारिणी ॥ जय अम्बे गौरी…

ब्रह्माणी रुद्राणी, तुम कमला रानी । अगम निगम बखानी, तुम शिव पात्राणी ॥ जय अम्बे गौरी…

चौंसठ योगिनी मंगल गावत, नृत्य करत भैरुंगी । बाजत ताल मृदंग करत, अनंद कन्ध मैं उड़ी ॥ जय अम्बे गौरी…

तुम हो जग की माता, तुम ही हो भर्ता भक्तान की । स्वर्ग हे अव्धुत स्थान पर, करो कृपा अति भक्ति पर ॥ जय अम्बे गौरी…

ब्रह्म वैष्णवी सदा वरदा, जनम जनम की दुख विसरदा । जो कोई जन गाता, रिद्धि सिद्धि धन पाता ॥ जय अम्बे गौरी…

भव भांडनि तुम्हारी दुर्गा, जन्म जन्म के पाप नसा। अंत काल रघुबर पुर जाई, जहाँ जन्म हरि-भक्त कहाई॥ जय अम्बे गौरी…

दुर्गा चालीसा जो कोई गावै, सब सुख भोग परम्परापावै। पुत्रन की जनम कारण बंधावै, सुख सम्पत्ति गरीब न आवै॥ जय अम्बे गौरी…

सत युग में देव बहुत आए, मगन भूमि भारी भूरि दुःख पाए। तापर लोग जाहि विद्याधर, सुर नर असुर नर निगम जाही॥ जय अम्बे गौरी…

सत्य युग की अद्भुत गाथा, प्रेम प्रकाशित कीन्ह द्वार पाथा। द्वापर त्रेता समय अवतारा, भव भय हारिणी दुर्गा आरा॥ जय अम्बे गौरी…

त्रैलोक्य की सुजन हैं, यही भाव अति शोभन हैं। पूजन तुम्हें जो यह कहें, दास शिवानी कृपा लें॥ जय अम्बे गौरी…

माता दुर्गा की जय।

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